उत्तराखंड आईं पर वोट नहीं डाल पाएंगी! | | The Rajneeti | Nepal | Pithoragarh News | Voter List

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जी हां दोस्तो क्या उत्तराखंड की बहू बनने के बाद भी महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं मिलेगा? क्या शादी के बाद दूसरे राज्य से आई महिलाओं के लिए लोकतंत्र में अपनी भागीदारी दर्ज कराना इतना आसान नहीं है? आखिर ऐसी कौन सी कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसकी वजह से हजारों महिलाएं वोटर सूची में नाम दर्ज नहीं करा पा रही हैं? बताउंगा आपको पूरी खबर और इसके पीछे के बड़ी वजह। दोस्तो उत्तराखंड में इन दिनों एक ऐसा मुद्दा चर्चा में है, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। शादी के बाद दूसरे राज्यों से उत्तराखंड आईं कई महिलाएं अब भी मतदान के अधिकार से वंचित हैं। सवाल यह है कि क्या ये नियमों की जटिलता है, जागरूकता की कमी है या फिर व्यवस्था की कोई बड़ी खामी?आखिर क्यों उत्तराखंड की बहू बनने के बावजूद कई महिलाएं वोट नहीं डाल पा रहीं? क्या है इसके पीछे की पूरी वजह और क्या इसका कोई समाधान है? दोस्तो उत्तराखण्ड में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया शुरू होने से नेपाल से विवाह कर भारत आईं महिलाओं की चिंता बढ़ गई है। वर्षों से भारतीय परिवारों का हिस्सा बन चुकीं अनेक नेपाली मूल की विवाहिता महिलाएं अब मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने से वंचित रह सकती हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण भारतीय नागरिकता और आवश्यक दस्तावेजों का अभाव बताया जा रहा है। इस मुद्दे ने राज्य के सीमांत क्षेत्रों खासतौर पर नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर नई चर्चा को जन्म दे दिया है, क्योंकि भारत और नेपाल के बीच दशकों पुराने रोटी-बेटी के संबंधों के कारण बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जिनका जीवन दोनों देशों के सामाजिक रिश्तों से जुड़ा हुआ है। दोस्तो एसआईआर के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में केवल उन्हीं लोगों के नाम शामिल किए जा रहे हैं जो निर्धारित दस्तावेज और पात्रता की शर्तें पूरी करते हैं। ऐसे में नेपाल से विवाह कर आईं कई महिलाओं का नाम मतदाता सूची में शामिल होने की संभावना कम दिखाई दे रही है।

सीमांत पिथौरागढ़ के स्थानीय लोगों का कहना है कि शादी के बाद ये महिलाएं पूरी तरह भारतीय परिवारों का हिस्सा बन चुकी हैं, लेकिन नागरिकता संबंधी प्रक्रियाएं पूरी न होने के कारण उन्हें कई सरकारी सुविधाओं और अधिकारों से वंचित रहना पड़ रहा है। दोस्तो पिथौरागढ़ सहित उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों में भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते रहे हैं। यहां दोनों देशों के लोगो के बीच रोटी बेटी का रिश्ता आम है। दोनों देशों के नागरिकों के बीच विवाह कोई नई बात नहीं है। वर्तमान समय में भी जिले के अनेक परिवारों में नेपाल की बहुएं रह रही हैं। स्थानीय समाज का कहना है कि वर्षों से यहां रह रही महिलाओं को पहचान और दस्तावेजों से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। अब मतदाता सूची के पुनरीक्षण ने उनकी चिंताओं को और बढ़ा दिया है। दोस्तो इस मुद्दे को लेकर विभिन्न सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों ने प्रशासन का ध्यान भी आकर्षित किया है। स्थानीय नेताओँ के एक प्रतिनिधिमंडल ने जिला प्रशासन से मुलाकात कर मामले का समाधान निकालने की मांग उठाई। प्रतिनिधिमंडल का कहना था कि नेपाल से विवाह कर आई महिलाओं का न तो आधार कार्ड बन पा रहा है और न ही कई अन्य आवश्यक दस्तावेज। ऐसे में उनके लिए मतदाता सूची में नाम दर्ज कराना लगभग असंभव हो गया है।

इधर दोस्तो स्थानीय लोगों का दावा है कि जिले में लगभग डेढ़ हजार से अधिक नेपाली मूल की विवाहिता महिलाएं इस स्थिति से प्रभावित हो सकती हैं। यदि नागरिकता और दस्तावेजों की समस्या का समाधान नहीं हुआ तो वे आगामी चुनावों में मतदान के अधिकार से वंचित रह जाएंगी। लोगों ने केंद्र सरकार और संबंधित विभागों से इस विषय पर स्पष्ट नीति बनाने तथा वर्षों से भारत में रह रही महिलाओं के लिए व्यावहारिक समाधान निकालने की मांग की है। वहीं दोस्तो बात कर प्रशासन की करुं तो वो कहाता है कि मतदाता सूची में नाम दर्ज करने की प्रक्रिया सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार ही संचालित की जाएगी। अपर जिलाधिकारी योगेंद्र सिंह के अनुसार वर्तमान नियमों के तहत भारतीय नागरिकता प्राप्त किए बिना किसी भी नेपाली मूल की महिला का नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य में यदि सरकार इस संबंध में कोई नया दिशा-निर्देश जारी करती है तो उसी के अनुरूप निर्णय लिया जाएगा। दोस्तो सीमावर्ती क्षेत्रों में यह केवल मतदान का मुद्दा नहीं है, बल्कि पहचान और अधिकारों से जुड़ा एक व्यापक सामाजिक प्रश्न बनता जा रहा है। वर्षों से भारतीय परिवारों में जीवन बिता रही अनेक महिलाएं आज भी आधिकारिक दस्तावेजों के अभाव में कई सुविधाओं से दूर हैं। फिलहाल निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार और प्रशासन इस संवेदनशील विषय पर आगे क्या रुख अपनाते हैं। यदि कोई ठोस समाधान नहीं निकला तो आने वाले समय में बड़ी संख्या में नेपाली मूल की विवाहिता महिलाएं लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी से वंचित रह सकती हैं।