दोस्तो, हिमालय की ताजा तस्वीरें सिर्फ हैरान करने वाली नहीं, बल्कि बड़ा सवाल खड़ा कर रही हैं! उत्तराखंड के ओम पर्वत से बर्फ गायब होने का सिलसिला आखिर क्यों दिख रहा है? 10 साल में तीसरी बार सामने आई इस तस्वीर के पीछे क्या है बड़ा संकेत? क्या ये प्रकृति का आखिरी अल्टीमेटम है? बताऊंगा आपको कैसे हुआ ये खौफनाक चमत्कार। दोस्तो करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र, आदि कैलाश मार्ग पर स्थित वो पवित्र चोटी जो सदियों से बर्फ की मखमली सफेद चादर ओढ़े रहती थी। आज वो चोटी बिल्कुल सूनी और कोयले जैसी काली पड़ चुकी है! जी हां, हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में 14,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित विश्व प्रसिद्ध ओम पर्वत की। जहां सावन और मानसून के इस मौसम में बर्फ की मोटी परत होनी चाहिए थी, वहां आज बर्फ का एक कतरा तक नहीं बचा है, जिसके कारण पहाड़ों पर बनने वाली ‘ॐ’ की दिव्य आकृति ही गायब हो गई है! पिछले 10 साल में ऐसा तीसरी बार हुआ है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ मौसम का फेरबदल है, या फिर विकास और पर्यटन के नाम पर हिमालय के सीने को छलनी करने का नतीजा है? आखिर क्यों रो रहा है हमारा हिमालय, वीडियो में अंत तक बने रहिएगा, ताकी बहुत जानपाएं आप सब। दोस्तो उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ की व्यास घाटी से एक ऐसी विचलित करने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने पर्यावरणविदों से लेकर शिव भक्तों तक को सन्न कर दिया है। समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित राजसी ओम पर्वत इस समय पूरी तरह बर्फविहीन हो चुका है। चोटी पर नाममात्र की भी बर्फ नहीं बची है, जिसके कारण वह पवित्र ‘ॐ’ का स्वरूप पूरी तरह धुंधला और लुप्त हो गया है, जो कभी दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं की आंखें तृप्त करता था। स्थानीय ग्रामीण और तीर्थयात्री इस सूनी चोटी को देखकर हैरान और बेहद चिंतित हैं।
साल 2016: सितंबर में पहली बार नाममात्र की बर्फ बची। साल 2024: अगस्त के महीने में पहली बार चोटी पूरी तरह सूखी। साल 2026 (अब): मानसून के बीच चोटी फिर से पूरी तरह काली पड़ी। दोस्तो ये कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि पिछले एक दशक यानी 10 सालों में ऐसा तीसरी बार हुआ है जब ओम पर्वत ने अपनी बर्फ की चादर खो दी है। इससे पहले साल 2016 और फिर साल 2024 के अगस्त महीने में भी यह चोटी इसी तरह बर्फविहीन होकर काली पड़ गई थी। इतिहासकार और पर्यावरण के जानकार पद्मश्री शेखर पाठक सहित कई विशेषज्ञ बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में हिमपात की अवधि और मात्रा का इस कदर घटना सामान्य बात नहीं है। दोस्तो ये इस बात का सीधा प्रमाण है कि ग्लोबल वार्मिंग का सबसे क्रूर असर अब हमारे ग्लेशियरों पर दिखने लगा है, लेकिन दोस्तो इस तबाही के पीछे सिर्फ प्रकृति ज़िम्मेदार नहीं है, बल्कि इंसानों का बढ़ता लालच और हस्तक्षेप भी बड़ा कारण है। पिछले कुछ सालों में व्यास और दारमा घाटी में सड़कों का जाल बिछाया गया है, हेलीपैड बने हैं और आदि कैलाश यात्रा सुगम होने से पर्यटकों और वाहनों की संख्या में रिकॉर्ड तोड़ बढ़ोतरी हुई है। वाहनों से निकलने वाला धुँआ, कार्बन और प्रदूषण इस संवेदनशील इको-सेंसिटिव जोन के तापमान को तेजी से बढ़ा रहे हैं। जब क्षमता से अधिक गाड़ियां और इंसान 14,000 फीट की ऊंचाई पर पहुंचेंगे, तो वहां की सदियों पुरानी बर्फ का पिघलना निश्चित है।
दोस्तो जानकारों का कहना है कि ओम पर्वत का इस तरह बार-बार काला पड़ना आने वाली किसी बड़ी आपदा की आहट हो सकता है। यदि समय रहते इस उच्च हिमालयी क्षेत्र में पर्यटकों की संख्या, गाड़ियों की आवाजाही और अंधाधुंध निर्माण कार्यों पर सख्त नियम नहीं बनाए गए, तो न सिर्फ यहाँ का धार्मिक पर्यटन खत्म हो जाएगा, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह तबाह हो जाएगा। प्रशासन को पर्यटन के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन के लिए तत्काल कोई ठोस कार्ययोजना बनानी होगी। दोस्तो ओम पर्वत से ‘ॐ’ की आकृति का इस तरह गायब होना सिर्फ एक तस्वीर नहीं, बल्कि हम इंसानों के लिए प्रकृति की एक आखिरी चेतावनी है। अगर हम अब भी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियां इन पहाड़ों पर सिर्फ काले पत्थर ही देख पाएंगी। इस गंभीर मुद्दे पर आपकी क्या राय है? क्या इस संवेदनशील क्षेत्र में गाड़ियों और पर्यटकों की संख्या सीमित होनी चाहिए? कमेंट बॉक्स में अपनी बेबाक राय ज़रूर दें। हिमालय को बचाने की इस मुहिम और आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने के लिए इस वीडियो को फेसबुक और यूट्यूब पर सबसे ज्यादा शेयर करें। हमारे चैनल को फॉलो करना न भूलें।