Pithoragarh BJP नेता ने खोली पोल पट्टी! | Suresh Joshi | Janata Darbar | CM Dhami | Uttarakhand News

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दोस्तो क्या उत्तराखंड में डबल इंजन सरकार का कोई इंजन पटरी से उतर गया है? क्या सरकारी अफसरशाही जनता की समस्याओं को लेकर पूरी तरह बेपरवाह हो चुकी है? क्या बीजेपी के अपने नेता भी अब सिस्टम से निराश नजर आ रहे हैं? बताउँगा आपको पूरी खबर कि कैसे बीजेपी के नेता ने ही पूछ लिया किया की डबल इंजन का का कौन सा इंजन काम कर रहा है। कैसे एक एक कर भरी बैठक में गिना डाली अपनी ही सरकार की एक एक कमियां। दोस्तो आपने कहा, मेने भी कहा, लेकिन किसी ने नहीं सुना लेकिन अब तो बीजेपी के नेता ही कहने लगे हैं कि हमारी भी कोई एक नहीं सुनता। पूरी खबर देखना दंग रह जाएंगे ये तब जब उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार को 10 साल होने को और अगला चुनाव सर पर लेकिन दोस्तो सवाल देखिए — फिर जवाब की बात होगी। दोस्तो ये सवाल पूछ कर पिथौरागढ़ में बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश महामंत्री सुरेश जोशी ने अपनी ही सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। डीएम के जनता दरबार में सुरेश जोशी ने बदहाल सड़कों, झाड़ियों से घिरे मार्गों, अधूरे विकास कार्यों, नगर निगम की अव्यवस्थाओं और अफसरों की कार्यशैली पर खुलकर नाराजगी जताई। इतना ही नहीं, उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर डबल इंजन और ट्रिपल इंजन सरकार का कौन सा इंजन काम कर रहा है और कौन सा सिर्फ धुआं छोड़ रहा है। बीजेपी नेता के इन बयानों ने न सिर्फ सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि सरकार के विकास दावों को भी कठघरे में ला खड़ा किया है। अब दोस्तो ये सवाल हम नहीं पूछ रहे। ये सवाल अब भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और उत्तराखंड बीजेपी के पूर्व महामंत्री सुरेश जोशी पूछ रहे हैं।

पिथौरागढ़ में डीएम के जनता दरबार में सुरेश जोशी ने जिस तरह से अपनी बात रखी, उसने सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दोस्तो एक बैठक में सुरेश जोशी कहते हैं कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनने वाली एक महत्वपूर्ण सड़क का टेंडर दो साल पहले हो चुका है। मामला हाईकोर्ट में पहुंच गया। दोनों पक्ष स्थानीय ठेकेदार हैं। लेकिन इस कानूनी विवाद की कीमत आखिर कौन चुका रहा है? जनता। वह जनता जो आज भी दो-दो फीट गहरे गड्ढों वाली सड़क पर चलने को मजबूर है। यहां दोस्तो जोशी का सवाल है कि क्या पिथौरागढ़ के आगे कोई गांव नहीं है? क्या वहां कोई आबादी नहीं रहती? क्या वहां इंसान नहीं रहते? आखिर क्यों विकास कार्यों को स्थानीय विवादों और प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ा दिया गया है? दोस्तो सिर्फ सड़क ही नहीं, सर्किट हाउस का मामला भी कुछ ऐसा ही है। टेंडर हो चुका है, प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन स्थानीय ठेकेदारों के विवाद के कारण निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ पा रहा सवाल वही है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है? और जवाबदेही कौन तय करेगा? दोस्तो सुरेश जोशी की नाराजगी सिर्फ बड़ी परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। उनका गुस्सा उन छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर भी है जिनसे आम लोग हर दिन जूझ रहे हैं वे कहते हैं कि ग्रामीण सड़कें चलने लायक नहीं बची हैं। जगह-जगह बड़े-बड़े गड्ढे हैं। सड़क किनारे झाड़ियां इतनी बढ़ चुकी हैं कि उनमें जंगली जानवर तक छिप सकते हैं। बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश महामंत्री सुरेश जोशी बताते हैं कि उन्होंने कई बार संबंधित अधिकारियों, जेई, एसीएम और अन्य जिम्मेदार लोगों से बात की। बार-बार कहा कि कम से कम झाड़ियां ही कटवा दीजिए।

इतना बजट तो विभाग के पास होगा। लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं। दोस्तो बीजेपी नेता का ये भी कहना है कि पीडब्ल्यूडी की हालत ऐसी हो गई है जैसे किसी बच्चे को पढ़ा-लिखाकर उसके हाल पर छोड़ दिया जाए। सड़क बनाकर छोड़ दी गई, लेकिन उसके रखरखाव की किसी को चिंता नहीं। न कोई सुनने वाला है, न कोई देखने वाला। दोस्तो मामला सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं है। पिथौरागढ़ नगर निगम की कार्यप्रणाली पर भी सुरेश जोशी ने सवालों की झड़ी लगा दी। उन्होंने कहा कि नगर निगम बनने पर लोगों को उम्मीद थी कि अब सुविधाएं बढ़ेंगी, व्यवस्था सुधरेगी, लेकिन हालात इसके उलट दिखाई दे रहे हैं। मुख्य सड़कों पर तो सफाई और व्यवस्था दिख जाती है, लेकिन वार्डों के भीतर नालियां बदहाल हैं। जलभराव की समस्या है। लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जोशी का सवाल है कि क्या सारे लोग सिर्फ मुख्य सड़क पर रहते हैं? वार्डों के भीतर रहने वाले लोग क्या नागरिक नहीं हैं? उन्होंने फॉगिंग मशीनों का मुद्दा भी उठाया। कहा कि मशीनें खरीदी गईं, लेकिन उनका उपयोग नहीं हो रहा। दूसरी ओर आवारा कुत्तों की समस्या लगातार बढ़ रही है। लोगों पर हमले हो रहे हैं। ठेके दिए गए हैं, भुगतान भी हो रहा है, लेकिन जमीन पर परिणाम दिखाई नहीं दे रहे। वहीं दोस्तो डीएम के जनता दरबार में सुरेश जोशी ने साफ कहा कि उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि जनता को इस अव्यवस्था से राहत मिले। समस्याओं का समाधान हो। जिम्मेदार अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभाएं। दोस्तो दिलचस्प बात यह है कि ये सवाल विपक्ष नहीं उठा रहा, ये सवाल उस पार्टी के वरिष्ठ नेता उठा रहे हैं जो प्रदेश और केंद्र दोनों जगह सत्ता में है। ऐसे में यह बहस और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि आखिर विकास के दावे और जमीनी हकीकत के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों दिखाई दे रहा है? दोस्तो जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार जैसे नारों और अभियानों के बीच अगर बीजेपी के अपने वरिष्ठ नेता ही व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं, तो यह संकेत है कि कहीं न कहीं सिस्टम में गंभीर खामियां हैं। और जब सत्ता पक्ष के नेता ही कहने लगें कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही, तो आम जनता की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।