देवभूमि पर उठाए सवाल! | Harsh Chikara | Rishikesh News | Uttarakhand News | Viral Video | Harayana

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दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड पर सवाल उठे हैं, पूछा जा रहा है कि आखिर उत्तराखंड को देवभूमि क्यों कहा जाता है? हद कर दी इन हरियाणा के यूट्यबर ने हर्ष छिकारा ने अब ये क्या यह सिर्फ एक नाम है दोस्तो इसके पीछे हजारों वर्षों का इतिहास, आस्था और आध्यात्मिक विरासत छिपी हुई है? हर्ष छिकारा जी, सवाल पूछना अच्छी बात है, लेकिन जवाब भी पूरे तथ्य के साथ सुनिए। चारधाम से लेकर गंगा के उद्गम तक, ऋषियों की तपस्थली से लेकर पांडवों के स्वर्गारोहण मार्ग तक, आज मै आपको बताउंगा आखिर उत्तराखंड को देवभूमि क्यों कहा जाता है और जो मै नहीं बता पाया वो मेरे दर्शक बताएंगे। दोस्तो, हाल ही में हरियाणा के यूट्यूबर हर्ष छिकारा ने सवाल पूछा कि आखिर उत्तराखंड को देवभूमि क्यों कहा जाता है? यहां कौन से देवता रहते हैं? किसका जन्म हुआ? और क्या सिर्फ उत्तराखंड ही देवभूमि है? सबसे पहले मैं यह स्पष्ट कर दूं कि भारत का हर कण पवित्र है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और द्वारका से कामाख्या तक पूरा भारत आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत से भरा हुआ है, लेकिन कुछ स्थान ऐसे हैं जिन्हें उनके धार्मिक, पौराणिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व के कारण विशेष पहचान मिली है। उत्तराखंड उन्हीं में से एक है, इसलिए सदियों से इसे “देवभूमि” कहा जाता है। अब सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों? पहला कारण – चारधाम की भूमि यदि हिंदू आस्था की बात करें तो उत्तराखंड को चारधाम की धरती कहा जाता है। बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे विश्व प्रसिद्ध धाम यहीं स्थित हैं।बद्रीनाथ भगवान विष्णु का धाम है, केदारनाथ भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जबकि गंगोत्री और यमुनोत्री भारत की दो सबसे पवित्र नदियों के उद्गम स्थल हैं। हर साल लाखों श्रद्धालु हजारों किलोमीटर की यात्रा करके यहां पहुंचते हैं। यदि किसी एक राज्य में हिंदू धर्म के इतने महत्वपूर्ण तीर्थस्थल मौजूद हों, तो उसे देवभूमि कहना स्वाभाविक है।

दूसरा कारण – गंगा और यमुना का उद्गमभारत की संस्कृति, सभ्यता और आस्था की पहचान गंगा और यमुना हैं। गंगा केवल एक नदी नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है। यमुनोत्री से यमुना और गंगोत्री क्षेत्र से गंगा का उद्गम होता है।जिस भूमि से भारत की सबसे पवित्र नदियां निकलती हों, वह भूमि केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं बल्कि आध्यात्मिक धरोहर बन जाती है। दोस्तो ऐसे की कारण में आज हर्ष छिकारा भाई को बताना चाहता हूं और जो मै ना बता पाउं उन्हें आप भी बता देना कमेंट के जरिए खैर आगे बड़ता हूं। तीसरा कारण – ऋषि-मुनियों की तपस्थली उत्तराखंड को केवल मंदिरों की वजह से देवभूमि नहीं कहा जाता, बल्कि इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि यह ऋषियों और तपस्वियों की भूमि रही है। मान्यताओं के अनुसार महर्षि व्यास, नारद, अगस्त्य, पराशर और अनेक ऋषियों ने हिमालय की गोद में तपस्या की।आज भी उत्तराखंड के पहाड़ों में ऐसी अनेक गुफाएं और स्थान मौजूद हैं जहां साधु-संत और योगी साधना करते हैं।हजारों वर्षों से यह क्षेत्र ज्ञान, योग और अध्यात्म का केंद्र रहा है। चौथा कारण – महाभारत और पुराणों से गहरा संबंध। उत्तराखंड का संबंध केवल आस्था से नहीं बल्कि भारतीय इतिहास और पौराणिक ग्रंथों से भी है।माना जाता है कि बद्रीनाथ के पास स्थित माना गांव की व्यास गुफा में महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना की थी।यहीं से पुराणों और वैदिक ज्ञान की परंपरा आगे बढ़ी।जब किसी क्षेत्र का संबंध दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत से जुड़ता है, तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है।

पांचवां कारण – पंच केदार और पंच बद्री उत्तराखंड में केवल केदारनाथ और बद्रीनाथ ही नहीं हैं।यहां भगवान शिव के पांच प्रमुख धाम हैं जिन्हें पंच केदार कहा जाता है— केदारनाथ, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मध्यमहेश्वर और कल्पेश्वर।इसी प्रकार भगवान विष्णु के पांच प्रमुख धाम पंच बद्री के नाम से प्रसिद्ध हैं।भारत में शायद ही कोई दूसरा क्षेत्र होगा जहां शिव और विष्णु दोनों की इतनी समृद्ध धार्मिक परंपरा एक साथ देखने को मिलती हो। छठा कारण – हर गांव के अपने देवता उत्तराखंड की सबसे बड़ी विशेषता उसकी लोक संस्कृति है।यहां केवल बड़े मंदिर ही नहीं हैं, बल्कि लगभग हर गांव का अपना इष्ट देवता और ग्राम देवता होता है।जागर जैसी परंपराएं आज भी जीवित हैं, जहां लोकदेवताओं का आह्वान किया जाता है।यह परंपरा बताती है कि यहां धर्म केवल मंदिरों तक सीमित नहीं बल्कि लोगों के जीवन का हिस्सा है। सातवां कारण – हजारों प्राचीन मंदिर उत्तराखंड में हजारों छोटे-बड़े मंदिर हैं। अल्मोड़ा का जागेश्वर धाम, ऋषिकेश का नीलकंठ महादेव, दुनिया का सबसे ऊंचाई पर स्थित शिव मंदिर तुंगनाथ, कैंची धाम, कटारमल सूर्य मंदिर और अनेक धार्मिक स्थल इसकी पहचान हैं।ये मंदिर केवल पूजा के केंद्र नहीं बल्कि हजारों साल पुरानी संस्कृति और इतिहास के जीवंत प्रमाण हैं। आठवां कारण – महाभारत और रामायण से जुड़ाव पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने स्वर्गारोहण की यात्रा उत्तराखंड से ही शुरू की थी।बद्रीनाथ के आगे माना गांव और स्वर्गारोहिणी मार्ग का उल्लेख आज भी किया जाता है।रामायण और अन्य पुराणों में भी हिमालय और इस क्षेत्र का विशेष वर्णन मिलता है।इसलिए उत्तराखंड केवल वर्तमान की आस्था नहीं बल्कि प्राचीन भारतीय सभ्यता का भी हिस्सा है। नौवां कारण – आध्यात्म और प्रकृति का अद्भुत संगम अब सबसे महत्वपूर्ण बात। उत्तराखंड को देवभूमि केवल इसलिए नहीं कहा जाता कि यहां मंदिर हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि यहां प्रकृति और अध्यात्म का अद्भुत संगम है। हिमालय की ऊंची चोटियां, बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाएं, शांत घाटियां, गुफाएं, जलप्रपात और पवित्र नदियां सदियों से साधकों को आकर्षित करती रही हैं।यहां का वातावरण मन को शांति देता है। यही कारण है कि योग, ध्यान और साधना के लिए दुनिया भर के लोग उत्तराखंड आते हैं।तो दोस्तो, उत्तराखंड को देवभूमि इसलिए नहीं कहा जाता कि यहां किसी एक देवता का जन्म हुआ या कोई विशेष दावा किया जाता है।इसे देवभूमि इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां चारधाम हैं, गंगा-यमुना का उद्गम है, ऋषियों की तपस्थली है, महाभारत और पुराणों से जुड़ी विरासत है, पंच केदार और पंच बद्री हैं, हजारों मंदिर हैं, लोकदेवताओं की जीवंत संस्कृति है और प्रकृति तथा अध्यात्म का अद्भुत संगम है।भारत का हर प्रदेश अपने आप में महान है, लेकिन उत्तराखंड की पहचान उसकी इसी आध्यात्मिक विरासत और देव संस्कृति के कारण “देवभूमि” के रूप में बनी हुई है।अब आप बताइए, क्या आपको भी लगता है कि उत्तराखंड को देवभूमि कहने के पीछे ये ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक कारण पर्याप्त हैं? अपनी राय जरूर दीजिए।