दोस्तो जिस अंग्रेजी सेना की वर्दी पहनकर वो ब्रिटिश हुकूमत की हिफाजत करने निकला था, उसी वर्दी में उसने गोरों के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया! दोस्तो रुद्रप्रयाग का वो जांबाज सिपाही आखिर कौन था, जिसने अंग्रेजों के ही कैंप में रहकर उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया? कहते हैं, उसकी बगावत की खबर ने ब्रिटिश अफसरों की नींद उड़ा दी थी।लेकिन संग्राम सिंह के भीतर ऐसी कौन-सी आग थी, जिसने उसे अपनी ही फौज के खिलाफ खड़ा कर दिया?आज सुनिए उस पहाड़ी वीर की अनसुनी कहानी, जिसे इतिहास के पन्नों में वो जगह नहीं मिल सकी, जिसका वो हकदार था। दोस्तो शत्रु के सामने मैदान-ए-जंग में खड़े होकर लड़ना बहादुरी है, लेकिन शत्रु के ही खेमे में भर्ती होकर, उसकी ही बंदूक लेकर, उसकी ही नाक के नीचे विद्रोह की स्क्रिप्ट लिख देना। यह महा-बहादुरी है! आज हम आपको देवभूमि उत्तराखंड के एक ऐसे ही जांबाज फौजी की कहानी बताने जा रहे हैं, जो अंग्रेजी सेना में सिपाही थे, लेकिन उनका दिल सिर्फ और सिर्फ भारत माता के लिए धड़कता था। रुद्रप्रयाग के उखीमठ के रहने वाले सिपाही संग्राम सिंह! एक ऐसा नाम जिसने ब्रिटिश फौज के बैरकों के भीतर रहकर भारतीय सैनिकों को आजादी की जंग के लिए तैयार किया था। कैसे इस अकेले फौजी ने ब्रिटिश आर्मी के भीतर एक खुफिया टाइम बम प्लांट कर दिया था। दोसतो, रुद्रप्रयाग जिले के ऐतिहासिक और धार्मिक क्षेत्र उखीमठ के एक साधारण परिवार में संग्राम सिंह का जन्म हुआ था।
पहाड़ के युवाओं की तरह वे भी देश सेवा का जज्बा लेकर साल 1924 में ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल हुए। दोस्तो सिपाही संग्राम सिंह एक बेहतरीन निशानेबाज, अनुशासित और होनहार सैनिक थे, जिसके कारण ब्रिटिश कमांडर उन पर बहुत भरोसा करते थे। संग्राम सिंह ने सेना के कठिन प्रशिक्षण को बहुत जल्दी सीख लिया। लेकिन जैसे-जैसे वे देश के हालात को देख रहे थे, उनका दिल कचोटता था कि वे जिस वर्दी को पहनकर बंदूक उठा रहे हैं, वो असल में उनके अपने ही देश को गुलाम बनाए रखने का जरिया है। उन्होंने तय किया कि वे सेना के भीतर रहकर ही इसका बदला लेंगे। दोस्तो सिपाही संग्राम सिंह ने सेना के भीतर एक बेहद खतरनाक और जानलेवा मिशन शुरू किया। वे दिन भर तो अंग्रेजों के सामने पूरी मुस्तैदी से परेड करते और सेल्यूट ठोकते, लेकिन रात के अंधेरे में वे मिलिट्री बैरकों के भीतर भारतीय सैनिकों के कमरों में जाते थे। वे सैनिकों को समझाते थे कि— ‘हम गोरों की चाकरी क्यों कर रहे हैं? हमारी बंदूकें हमारे देश की आजादी के लिए उठनी चाहिए।’ सिपाही संग्राम सिंह चोरी-छिपे सैनिकों के बीच महात्मा गांधी के भाषण, सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिंद फौज’ की खबरें और देशभक्ति के पर्चे बांटने शुरू कर दिए। देखते ही देखते, संग्राम सिंह ने अंग्रेजी सेना के भीतर ही राष्ट्रभक्त सैनिकों का एक मजबूत और खुफिया नेटवर्क तैयार कर लिया, जो सिर्फ एक इशारे पर अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने को तैयार थे। लेकिन दोस्तो इतिहास गवाह है कि जब-जब देश में कोई बड़ी क्रांति होने वाली होती है, कोई न कोई गद्दार सामने आ जाता है। संग्राम सिंह के इस बढ़ते खुफिया नेटवर्क की भनक ब्रिटिश मिलिट्री इंटेलिजेंस को लग गई। एक रात जब वे सैनिकों की गुप्त बैठक ले रहे थे, अंग्रेज अफसरों ने पूरी बैरक को घेर लिया। सिपाही संग्राम सिंह को रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया गया। एक सैनिक द्वारा सेना के भीतर ही राजद्रोह और सैन्य विद्रोह भड़काने का यह मामला बहुत गंभीर था। उनका कोर्ट मार्शल किया गया। अंग्रेज उनसे सच उगलवाने के लिए तड़पाते रहे। ‘बताओ, इस साजिश में तुम्हारे साथ और कौन-कौन से फौजी शामिल हैं?’
दोस्तो सिपाही संग्राम सिंह को कोड़ों से पीटा गया, भारी बेड़ियों में रखकर पत्थरों को तोड़ने के कड़े श्रम पर लगा दिया गया, लेकिन संग्राम सिंह ने अपने किसी साथी का नाम नहीं उगला। दोस्तो सिपाही संग्राम सिंह जैसे वीरों के कारण ही द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों को यह अच्छी तरह अहसास हो गया था कि अब वे भारतीय सैनिकों के भरोसे भारत पर राज नहीं कर सकते, क्योंकि अब सेना की वर्दी के भीतर भी देशभक्ति का बारूद भर चुका है। यही वो डर था जिसने अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया। देश की आजादी के बाद संग्राम सिंह अपने गांव लौटे और गुमनामी में जीवन बिताया, लेकिन उनका ये योगदान किसी भी बड़े आंदोलन से कम नहीं था, जिसने सीधे दुश्मन के किले के भीतर जाकर सुरंग खोद दी थी। दोस्तो वर्दी पहनकर देश के भीतर ही क्रांति का चक्रव्यूह रचने वाले सिपाही संग्राम सिंह की यह दास्तान हर हिंदुस्तानी के रोंगटे खड़े कर देती है। स्वतंत्रता दिवस के इस पावन मौके पर इस जांबाज सैनिक को हमारा कोटि-कोटि नमन। आपको देवभूमि के वीरों की वीरगाथा कैसी लगती है क्या कहेंगे आप कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर दें और इस वीडियो को शेयर करें।