दोस्तो आजाद भारत के इस जश्न के बीच क्या आप जानते हैं कि जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने नारा दिया था—’तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’, तो उस खून की आहुति देने में सबसे आगे कौन सा राज्य था? एक ऐसा पहाड़ी इलाका, जिसने नेताजी की फौज को अपने कलेजे के टुकड़े सौंप दिए। आज़ाद हिंद फौज का वो सच, जो इतिहास की किताबों में कहीं छिप गया। आखिर क्यों नेताजी अपने सबसे बड़े मिशनों पर सिर्फ उत्तराखंड के जांबाजों पर भरोसा करते थे? दोस्तो इतिहास गवाह है कि जब-जब देश पर आंच आई, देवभूमि उत्तराखंड के बेटों ने अपनी छाती आगे कर दी। बात साल 1942 की है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए ‘आज़ाद हिंद फ़ौज’ का पुनर्गठन किया। इस फौज में देश के कोने-कोने से सिपाही भर्ती हो रहे थे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि INA की कुल ताकत का लगभग 11 से 12 फीसदी हिस्सा अकेले उत्तराखंड से था? यानी फ़ौज का हर दसवां सिपाही एक पहाड़ी जांबाज था। 2,500 से अधिक वीर सैनिकों ने पहाड़ों को छोड़कर देश की आज़ादी के लिए कसम खाई थी। दोस्तो पहाड़ी युवाओं में देशप्रेम इस कदर था कि उन्होंने INA के शीर्ष पदों पर अपनी जगह बनाई। इनमें सबसे पहला और बड़ा नाम आता है कर्नल पितृशरण रतूड़ी का। कर्नल रतूड़ी को नेताजी ने आज़ाद हिंद फ़ौज की पहली बटालियन की कमान सौंपी थी। जब इंफाल और कोहिमा के मोर्चे पर अंग्रेजों से सीधी भिड़ंत हुई, तो कर्नल रतूड़ी की अगुवाई में पहाड़ी जवानों ने वो शौर्य दिखाया कि ब्रिटिश सेना के पैर उखड़ गए। उनकी इस बहादुरी के लिए खुद नेताजी ने उन्हें ‘सरदार-ए-जंग’ की उपाधि से नवाजा था।
दोस्तो इसी फौज में एक और चमकता सितारा थे कर्नल धन सिंह थापा, जिन्होंने बर्मा (म्यांमार) के जंगलों में अंग्रेजों के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध लड़कर इतिहास रच दिया। लेकिन कहानी सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती, नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपनी सुरक्षा को लेकर बेहद सतर्क रहते थे। उन पर कई बार जानलेवा हमले की कोशिश हुई थी। ऐसे में नेताजी ने अपनी जान की हिफाजत के लिए किसे चुना? वो थे पिथौरागढ़ के वीर सपूत देव सिंह दानू, देव सिंह दानू नेताजी के पर्सनल बॉडीगार्ड (निजी अंगरक्षक) थे, जो साए की तरह नेताजी के साथ रहते थे और उन पर आने वाली हर गोली को अपने सीने पर झेलने के लिए तैयार रहते थे। दोस्तो सिंगापुर के जंगलों से लेकर इंफाल के मोर्चे तक, उत्तराखंड के इन 2500 से ज्यादा जवानों ने “जय हिंद” और “कदम-कदम बढ़ाए जा” के गीतों के साथ अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला दी। इस महायज्ञ में उत्तराखंड के सैकड़ों जवानों ने हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन घुटने नहीं टेके। आज जब हम आज़ाद हवा में सांस ले रहे हैं, तो हमें आज़ाद हिंद फौज के इन पहाड़ी शेरों के इस सर्वोच्च बलिदान को कभी नहीं भूलना चाहिए। दोस्तो, आज़ादी की इस विरासत में उत्तराखंड के उन जांबाजों का योगदान भी दर्ज है, जिन्होंने अपना घर-परिवार छोड़कर देश की आज़ादी के लिए संघर्ष किया। आज़ाद हिंद फौज के इन वीरों की कहानी हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि अनगिनत बलिदानों की कीमत पर मिली हमारी विरासत है। इन गुमनाम और अमर सेनानियों को नमन करते हुए हमसे विदा लीजिए। ऐसी ही अनसुनी ऐतिहासिक कहानियों और उत्तराखंड से जुड़ी हर बड़ी खबर के लिए जुड़े रहिए उत्तराखंड न्यूज के साथ।