CM Dhami की सीट पर सस्पेंस!। BJP । Khatima । Uttarakhand News

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जी हां दोस्तो क्या उत्तराखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सीट पर सस्पेंस हैं, कि वो कहां से चुनावी मैदान में उतरेंगे। उत्तराखंड में 2027 के चुनावी रण का बिगुल बजने से पहले सबसे बड़ा सवाल—मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आखिर कुमाऊं की किस सीट से ताल ठोकेंगे? बागेश्वर से धामी ने कह दिया—सीट का फैसला हाईकमान करेगा! लेकिन खटीमा की हार और चंपावत में ऐतिहासिक जीत के बाद अब फिर वही सवाल—क्या धामी तीसरी बार मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रच पाएंगे, या विपक्ष उनकी राह में बड़ी चुनौती खड़ी करेगा? देखिए, धामी की सीट का सस्पेंस और 2027 की सियासत का पूरा समीकरण! दोस्तो उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल जो हर राजनीतिक गलियारे में गूंज रहा है, वो ये कि सूबे के कप्तान यानी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस बार कुमाऊं की किस विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरेंगे? बागेश्वर पहुंचे मुख्यमंत्री धामी ने इस यक्ष प्रश्न पर अपना रुख पूरी तरह साफ कर दिया है। धामी ने दो टूक अंदाज में कहा कि ‘हाईकमान का जहां से आदेश होगा, मैं वहीं से चुनाव लड़ूंगा।’ मुख्यमंत्री के इस बयान ने पहाड़ की सियासत का पारा 100 डिग्री के पार पहुंचा दिया है। खटीमा और चंपावत के पुराने अनुभवों के बीच, क्या धामी के लिए तीसरी बार मुख्यमंत्री बनना और बीजेपी के लिए सत्ता की हैट्रिक लगाना इतना आसान होगा। दोस्तो क्या आपको इस बयान में कुछ दिखाई दिया। दोस्तो 2027 के चुनावी समर से पहले देवभूमि उत्तराखंड की सियासत में शह और मात का खेल शुरू हो चुका है। बागेश्वर की धरती से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने विरोधियों को सीधा और स्पष्ट संदेश दे दिया है। जब उनसे पूछा गया कि इस बार वे कुमाऊं की किस हॉट सीट से ताल ठोकेंगे, तो धामी ने इसे आलाकमान के पाले में डाल दिया। लेकिन इस एक बयान के पीछे छिपी है बीजेपी की वो सोची-समझी रणनीति, जो उत्तराखंड की 70 सीटों पर फतेह हासिल करने के लिए बुनी जा रही है। सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि चंपावत के बाद धामी का अगला पड़ाव कौन सा होगा। दोस्तो पुष्कर सिंह धामी का राजनीतिक सफरनामा किसी रोलर-कोस्टर राइड से कम नहीं रहा है।

1975 में पिथौरागढ़ के एक साधारण सैनिक परिवार में जन्मे धामी ने लखनऊ विश्वविद्यालय से छात्र राजनीति की शुरुआत की थी। 30 साल से भी अधिक समय तक आरएसएस और विद्यार्थी परिषद की भट्टी में तपने के बाद, वे साल 2002 से 2008 तक भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे। साल 2012 में उन्होंने पहली बार खटीमा सीट से विधानसभा का टिकट पाया और जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसके बाद 2017 में भी धामी ने खटीमा से जीत दर्ज की। जुलाई 2021 में जब उत्तराखंड में राजनीतिक अस्थिरता का दौर था, तब बीजेपी ने महज 45 साल की उम्र में धामी को राज्य का सबसे युवा मुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका दिया था.. लेकिन दोस्तो धामी की असली परीक्षा साल 2022 के विधानसभा चुनाव में हुई। उत्तराखंड के इतिहास में आज तक कोई भी सत्तारूढ़ दल दोबारा सरकार नहीं बना पाया था। धामी के नेतृत्व में बीजेपी ने 47 सीटें जीतकर यह मिथक तो तोड़ दिया—लेकिन एक बहुत बड़ा उलटफेर हो गया। खुद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी पारंपरिक सीट खटीमा से कांग्रेस के भुवन चंद्र कापड़ी से करीब 7 हजार वोटों से चुनाव हार गए!

दोस्तो मुख्यमंत्री की इस हार ने उनके सियासी भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए, लेकिन आलाकमान ने उन पर दोबारा भरोसा जताया। इसके बाद चंपावत के विधायक कैलाश गहतोड़ी ने अपनी सीट छोड़ी और जून 2022 में हुए चंपावत उपचुनाव में धामी ने 93 फीसदी से ज्यादा वोट पाकर 55,025 वोटों की ऐतिहासिक जीत दर्ज की और अपनी कुर्सी सुरक्षित की। अब दोस्तो सवाल है कि क्या आगामी चुनाव में तीसरी बार मुख्यमंत्री बनना और उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार बीजेपी की सरकार बनाना उतना ही आसान है? राजनीतिक पंडितों की मानें तो इस बार की राह कांटों भरी है। एंटी-इन्कंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर), पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन और हाल ही में उधम सिंह नगर की नगर पालिका सीटों पर कांग्रेस की जीत ने बीजेपी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। हालांकि, राम माधव के नेतृत्व में बीजेपी ने ‘मिशन 60+’ का लक्ष्य रखा है और आरएसएस के दिनेश आर्य को राज्यसभा भेजकर बड़ा सोशल इंजीनियरिंग कार्ड खेला है, लेकिन कांग्रेस भी हरीश रावत की जनसंवाद यात्राओं के सहारे पलटवार के मूड में है। ऐसे में धामी को खुद के लिए एक ऐसी सुरक्षित सीट चुननी होगी जहां से वे न सिर्फ खुद जीतें, बल्कि पूरे कुमाऊं और गढ़वाल में पार्टी को लीड कर सकें, लेकिन दोस्तो आपको यहां ये बयान एक बार फिर सुनना चाहिए। दोस्तो साफ है कि पुष्कर सिंह धामी ने गेंद संगठन के पाले में डाल दी है, लेकिन पर्दे के पीछे 2027 के महासंग्राम की स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है। अब देखना यह होगा कि हाईकमान धामी को किस मोर्चे पर तैनात करता है और क्या ‘धाकड़ धामी’ का जादू तीसरी बार उत्तराखंड में कमल खिला पाएगा। इस क्या है आपकी राय कमेंट कर बताइयेगा।