गुटबाजी की भेंट चढ़ेगा 2027 का रण? | Uttarakhand News | Harish Rawat | Congress

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हरदा का एक पोस्ट और उत्तराखंड कांग्रेस में सियासी भूचाल! क्या गुटबजी की भेंट चढेगा 27 का रण? पहले बयान आते थे अब पोस्ट पर पोस्ट से नए नए धमाके हो रहे हैं। ‘शून्य में मिल सकता हूं, लेकिन टूट नहीं सकता!’ हरीश रावत के इस नए चेवर आखिर किसकी चिंता बढ़ा दी? हाईकमान की नाराजगी, प्रदेश संगठन से तल्खी और समर्थकों-विरोधियों के बीच तीखी बयानबाजी! कहीं हरदा अपना दर्द बयां कर रहे हैं, तो कहीं इसे सियासी दबाव की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन आप खबर देखिए। दोस्तो “लुढ़कते-लुढ़कते, घिसते-घिसते, शून्य में मिल सकता हूँ, लेकिन टूट नहीं सकता हूँ!” ये लिख तो दिया हरीश रावत ने पोस्ट के तौर पर, बड़ा लंबा चौड़ा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल—जब कांग्रेस के भीतर ही खींचतान जारी है, तो 2027 में बीजेपी को चुनौती देने की रणनीति कैसे बनेगी? क्या हाईकमान और हरदा के बीच सुलह होगी, या बढ़ेगी सियासी दूरियां? ये सवाल इसलिए क्योंकि दोस्तो उत्तराखंड में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के अंदर एक ऐसा ज्वालामुखी फटा है, जिसकी तपिश ने दिल्ली से लेकर देहरादून तक हड़कंप मचा दिया है। उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा विस्फोटक पोस्ट साझा किया है, जिसने पूरी पार्टी को हिलाकर रख दिया है। हरदा ने दो टूक शब्दों में लिखा है कि, “मैं लुढ़कते-लुढ़कते, घिसते-घिसते, शून्य में मिल सकता हूँ, लेकिन टूट नहीं सकता।”

दोस्तो हाईकमान की बेरुखी और प्रदेश संगठन के भीतर चल रही उपेक्षा से आहत हरदा के इस बयान ने कांग्रेस में खलबली मचा दी है। जहां उनके समर्थक उन्हें कांग्रेस का ‘बरगद’ बता रहे हैं, वहीं विरोधी खेमा हाईकमान से उनके खिलाफ सख्त एक्शन की मांग कर रहा है। सवाल उठता है कि अगर सूबे के सबसे कद्दावर नेता के पैर संगठन ही खींच रहा है, तो कांग्रेस 2027 का चुनावी रण कैसे जीतेगी? दोस्तो उत्तराखंड की सियासत में ‘हरदा’ कहे जाने वाले 78 वर्षीय बुजुर्ग योद्धा हरीश रावत ने एक बार फिर अपनी ही पार्टी के खिलाफ वो ब्रह्मास्त्र चला दिया है, जिससे पूरी कांग्रेस बैकफुट पर आ गई है! दिल्ली से लेकर उत्तराखंड तक सिर्फ एक ही पोस्ट की चर्चा है। हरदा ने लिखा कि यह शाश्वत सत्य है कि पार्टी से बड़ा कोई नहीं होता, लेकिन अगर वो पार्टी के लिए बोझ बन रहे हैं, तो वो बिना हिचक घर बैठ जाएंगे। इस एक बयान ने साफ कर दिया है कि उत्तराखंड कांग्रेस में अंदरूनी कलह और गुटबाजी अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां से वापसी का रास्ता बेहद कठिन है! दोस्तो आखिर इस कड़वाहट की असली वजह क्या है? दरअसल, हरीश रावत पिछले कुछ समय से पूरे प्रदेश में अपनी व्यक्तिगत ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ निकाल रहे हैं। इस यात्रा को लेकर उत्तराखंड कांग्रेस प्रभारी कुमारी सैलजा और राष्ट्रीय संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने सख्त नाराजगी जताई थी। आलाकमान ने साफ हिदायत दी थी कि किसी भी नेता की व्यक्तिगत यात्रा बर्दाश्त नहीं की जाएगी और सभी कार्यक्रम कांग्रेस के बैनर तले संयुक्त रूप से होंगे। दिल्ली से आई इसी फटकार और प्रदेश संगठन के नेताओं द्वारा हरदा की यात्रा से दूरी बनाने के बाद रावत का दर्द छलक उठा। उन्होंने संगठन पर सीधा सवाल उठाते हुए पूछा कि जब कांग्रेस का कोई आधिकारिक कार्यक्रम चल ही नहीं रहा है, तो फिर मेरी सक्रियता से दिक्कत क्यों है? दोस्तो हरदा के इस अल्टीमेटम के बाद पूरी पार्टी दो फाड़ नजर आ रही है। रावत समर्थक गुट और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल जैसे वरिष्ठ नेताओं का साफ कहना है कि हरीश रावत उत्तराखंड में कांग्रेस के वो ‘बरगद’ हैं, जिनकी छाया के बिना सूबे में कांग्रेस का अस्तित्व सोचना भी नामुमकिन है।

वहीं दूसरी तरफ, गणेश गोदियाल और विरोधी खेमे के नेताओं के सुर अलग हैं। संगठन से जुड़े कुछ नेताओं का अंदरूनी तौर पर मानना है कि हरदा चुनाव के ठीक पहले अपनी शर्तों को मनवाने और अपने करीबियों व परिवार के लिए टिकट पक्का करने के लिए यह दबाव की राजनीति (Pressure Tactics) कर रहे हैं। विरोधी चाहते हैं कि हाईकमान अनुशासनहीनता पर अब ठोस फैसला ले। दोस्तो इस पूरे विवाद में घी डालने का काम किया है पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत के उस ताजा रिएक्शन ने, जिसमें उन्होंने कहा कि उन्हें, 2016 में हरीश रावत सरकार के खिलाफ की गई बगावत का कोई मलाल नहीं है! इधर हरक सिंह ने पुराने जख्म कुरेदे, उधर धारचूला के कद्दावर कांग्रेस विधायक हरीश धामी ने साफ कह दिया कि 2027 में वो हाथ के सिंबल पर चुनाव नहीं लड़ेंगे! दोस्तो अपनों की यह बेरुखी और बगावत की ये आहटें बताती हैं कि बीजेपी की सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने के बजाय, कांग्रेस खुद को ही तबाह करने पर तुली है। दोस्तो राजनीति के जादूगर माने जाने वाले हरीश रावत जानते हैं कि उनका हर एक शब्द कहां और कितना घाव करता है। उन्होंने साफ कह दिया है कि प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन उनके रास्ते में कांटे बिछाना बंद होना चाहिए। सवाल ये है कि जब सेनापति और उसकी सेना ही आपस में लड़ रहे हों, तो कांग्रेस 2027 का महा-रण कैसे फतह करेगी? क्या हाईकमान हरदा की शक्तियों को बहाल करेगा या फिर बगावत की ये चिंगारी पूरी कांग्रेस को भस्म कर देगी?