दोस्तो, अब तक नदियों और सूरज से बिजली बनते तो आपने खूब देखा होगा लेकिन सोचिए, अगर धरती के अंदर छिपी गर्मी को ही बिजली में बदल दिया जाए तो? उत्तराखंड अब इसी अनोखी ऊर्जा के दरवाजे खोलने जा रहा है। चमोली का तपोवन और उत्तरकाशी का गंगनानी इस नए प्रयोग के केंद्र बनने वाले हैं—आखिर गर्म पानी के इन कुंडों में कितनी बिजली का दम छिपा है? क्या है ये पूरी खबर कैसे चमोली और उत्तरकाशी के गर्म पानी के कुंड बदलेंगे उत्तराखंड की किस्मत! और क्यों ये कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार से भी आगे निकला उत्तराखंड। दोस्तो नदियों का कल-कल बहता पानी और आसमान से चमकती सूरज की किरणें, इनसे तो हम सब बिजली बनाते आए हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस धरती पर हम पैर रखते हैं, उसके ठीक नीचे छिपी भीषण गर्मी और खौफनाक आग से भी घरों को रोशन किया जा सकता है? जी हां, उत्तराखंड देश का वो पहला राज्य बन चुका है जिसने केंद्र सरकार से भी चार कदम आगे बढ़कर अपनी ‘जियो थर्मल एनर्जी नीति’ लागू कर दी है! चमोली के तपोवन से लेकर उत्तरकाशी के गंगनानी तक, जहां सदियों से प्रकृति के रहस्यमयी गर्म पानी के स्रोत यानी हॉट स्प्रिंग्स उबल रहे हैं, वहां अब देश का सबसे अनोखा बिजलीघर बनने जा रहा है! आखिर कैसे काम करेगी ये तकनीक और कैसे दुनिया की सबसे बड़ी ताकतें उत्तराखंड के पहाड़ों में उतर चुकी हैं? दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड में स्वच्छ और हरित ऊर्जा का एक नया और ऐतिहासिक अध्याय शुरू हो चुका है। राज्य अब अपनी बारहमासी बहने वाली नदियों के बाद जमीन के नीचे दबे असीमित ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल करने जा रहा है। चमोली के ऐतिहासिक तपोवन क्षेत्र में धधकते गर्म पानी के स्रोतों से बिजली बनाने की संभावनाओं पर काम बेहद तेजी से शुरू हो गया है। उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड यानी UJVNL ने इसके लिए एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। वर्तमान में यहाँ ड्रिलिंग से पहले पूरे क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है।
वहीं दोस्तो दूसरी तरफ, उत्तरकाशी के गंगनानी में प्रदेश की पहली प्रस्तावित जियोथर्मल विद्युत परियोजना अपना शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण चरण पार कर चुकी है। दुनिया में जियोथर्मल एनर्जी के बेताज बादशाह कहे जाने वाले देश आइसलैंड की मशहूर कंपनी ‘वर्किस’ (Verkis) ने UJVNL को अपनी इनीशियल प्रोजेक्ट रिपोर्ट सौंप दी है। ये दोनों ही प्रोजेक्ट इतनी तेज रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं कि आने वाले कुछ ही सालों में यहाँ से बिजली ग्रिड को सप्लाई की जाने लगेगी। सबसे खास बात यह है कि जहां भारत सरकार का गैर-पारंपरिक ऊर्जा मंत्रालय अभी तक देश के लिए कोई जियोथर्मल नीति नहीं ला पाया है, वहीं उत्तराखंड इस दिशा में पूरे देश का नेतृत्व कर रहा है। दोस्तो राज्य सरकार इस प्रोजेक्ट को लेकर कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि धामी सरकार ने शुरुआती ड्रिलिंग और डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट यानी DPR तैयार करने के लिए 3 करोड़ रुपये का बजट भी तत्काल आवंटित कर दिया है और इसे समझा जा सकता है। कुल चिन्हित क्षेत्र- 90 से अधिक लोकेशंस (पूरे उत्तराखंड में) तपोवन प्रोजेक्ट क्षमता- 3 मेगावाट (शुरुआती चरण) गंगनानी प्रोजेक्ट क्षमता- 10 मेगावाट (प्रस्तावित) दोस्तो विशेषज्ञों के मुताबिक, उत्तराखंड की वादियों में जियोथर्मल ऊर्जा का एक महा-भंडार छिपा हुआ है। पूरे प्रदेश भर में ऐसे 90 से अधिक क्षेत्रों को चिन्हित किया जा चुका है जहां जमीन के भीतर भारी थर्मल एनर्जी मौजूद है। आने वाले समय में चरणबद्ध तरीके से इन सभी क्षेत्रों पर भी काम शुरू किया जाएगा। शुरुआती अनुमानों के तौर पर चमोली के तपोवन में 3 मेगावाट और उत्तरकाशी के गंगनानी में 10 मेगावाट बिजली उत्पादन की प्रबल संभावना जताई गई है। यह बिजली बिना किसी प्रदूषण के, चौबीसों घंटे और बिना रुके पैदा होती रहेगी, क्योंकि नदियों की तरह इसमें पानी कम होने का कोई खतरा नहीं है।
दोस्तो जियोथर्मल ऊर्जा को लेकर उत्तराखंड की ये कवायद कोई नई नहीं है, बल्कि दूरगामी सोच का नतीजा है। UJVNL आइसलैंड की तकनीक के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट को समय सीमा के भीतर पूरा करने के लिए रात-दिन जुटा हुआ है और इधर सरकार को पूरी उम्मीद है कि आने वाले समय में यह जियोथर्मल एनर्जी देश के ऊर्जा मानचित्र पर उत्तराखंड को एक ‘पावर हब’ के रूप में स्थापित करने में मील का पत्थर साबित होगी। हमारी इस खास रिपोर्ट पर आपकी क्या राय है? क्या पहाड़ों में ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल और बढ़ना चाहिए? कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं। इस वीडियो को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और हमारे चैनल को फॉलो करना न भूलें।