जी हां दोस्तो दिल्ली के मालवीय नगर के होटल में आग लगी, कई लोगों ने जान गवां दी, कई लोग घायल हो गए, लेकिन जब उत्तराखंड के एक कुक की गिरफ्तारी हुई तो सवाल तमाम बड़े खड़े हो गए। उत्तराखंड के निशाने पर दिल्ली की सरकार सिस्टम सब आ गया। उत्तराखंड से सियासी सवाल भी खूब हुए कि आखिर क्यों कुक केशव नेगी गिरफ्तारी हुई लेकन दोस्तो क्या सवाल उन लोगों से नहीं होना चाहिए जो सालों से दिल्ली में पहाड़ के नाम पर राजनीति करते है। उत्तराखंड के नाम पर वोट डकारते हैं, लेकिन केशव नेगी जैसे मामले में बीजेपी के इन उत्तराखंड मूल के दोनों विधायकों की जुबां क्यों नहीं खुल रही। दोस्तो मै आपको केशव नेगी की हुई गिरफ्तारी पर दिल्ली के दो उत्तराखंड के बीजेपी विधायकों की चुप्पी पर खबर बताउं उससे पहले पहले आपको एक अपडेड ये दे दूं केशव नेगी की गिरफ्तारी पर केशव नेगी की जमानत याचिका खारिज! क्योंकि दिल्ली की साकेत कोर्ट से नहीं मिली राहत। वहीं दोस्तो लगता ये लड़ाई लंबी चलने वाली है लेकिन इधर दोस्तो मेरी मन एक सवाल और आया वो कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से बात कर मामले में निष्पक्षा की मांग रखी तो दिल्ली की सीएम ने भी बरोसा दिया बल लेकिन दोस्तो दिल्ली पुलिस, दिल्ली सरकार के अधीन नहीं केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन आती है, गृह मंत्री अमित शाह दिल्ली पुलिस के बॉस हैं।
दोस्तो दिल्ली पुलिस प्रशासनिक रूप से केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन आती है, और इसकी निगरानी केंद्रीय गृह मंत्रालय के दायरे में होती है। ऐसे में जब किसी बड़े आपराधिक या संवेदनशील मामले में कार्रवाई होती है, तो स्वाभाविक रूप से उसकी जांच और प्रक्रिया निर्धारित कानूनी ढांचे के भीतर ही आगे बढ़ती है। हाल ही में दिल्ली के मालवीय नगर अग्निकांड से जुड़े मामले में उत्तराखंड के शेफ केशव नेगी की गिरफ्तारी के बाद यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक रूप से चर्चा में आ गया है। मामला अब सिर्फ एक कानूनी जांच नहीं रह गया, बल्कि इस पर अलग-अलग स्तरों पर प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। कुछ जनप्रतिनिधियों द्वारा दिल्ली सरकार के स्तर पर बातचीत और हस्तक्षेप की कोशिशें की गई हैं, वहीं कुछ नेताओं ने दिल्ली पुलिस आयुक्त से मुलाकात कर निष्पक्ष जांच की मांग भी रखी है। इन प्रयासों को अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है, लेकिन इसी बीच एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि जब दिल्ली पुलिस सीधे केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अंतर्गत काम करती है, तो क्या इस तरह के मामलों में बातचीत और संवाद का दायरा केवल राज्य सरकार या दिल्ली सरकार तक ही सीमित रहना चाहिए? या फिर यह अपेक्षा भी की जानी चाहिए कि सभी संबंधित पक्ष अपने-अपने स्तर पर सीधे और पारदर्शी तरीके से संवाद बनाए रखें? खैर मै बात करता हूं उत्तराखंड के दो दिल्ली में जो विधायक हैं वो केशव नेगी गिरफ्तारी पर क्या कर रहे हैं। क्योंक चुनाव में ये लोग उत्तराखंडियो के बीच जाकर पार्टी के लिए खूब वोट मांग रहे थे। दोस्तो दिल्ली में पहाड़ के नाम पर राजनीति कर रहे हैं वह पहाड़ी समाज से आते हैं इसलिए बीजेपी ने उनका टिकट देकर पटपड़गंज से विधायक बनाया है लेकिन केशव नेगी के प्रकरण में उनका कोई हस्तक्षेप न करना दुर्भाग्यपूर्ण है वहीं एक नाम और रविंद्र सिंह नेगी का वो भी उस तरीके से केशव की इंसाफ की लड़ाई लड़ते दिखाई नहीं दे रहे हैं। अब जरा इन दोनों नेताओं के बारे में जान लीजिए।
दोस्तो दिल्ली की राजनीति में उत्तराखंड के दो नेताओं, रविंद्र सिंह रवि नेगी और मोहन बिष्ट, की चर्चा जोरों पर रहती है। रविंद्र नेगी पटपड़गंज से विधायक विधायक हैं, जबकि मोहन मुस्लिम बहुल सीट मुस्तफाबाद में कमल खिलाने में कामयाबी हांसिल कर विधायक बने मोहन बिष्ट और रविंद्र नेगी दोनों ही उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले से ताल्लुक रखते हैं, लिहाजा दिल्ली की राजनीति में उनकी सक्रियता ने उन्हें एक अलग मुकाम दिलाया है और उत्तराखंडियो ने जो दिल्ली में रहते हैं इनके कहने पर पार्टी को यानि बीजेपी को वोट भी किया है लेकिन दोस्तो हैरानी तब होती है। जब ये दोनों उत्तराखंड के मसलों पर दिल्ली में लोगो को होती परेशानी पर वैसे मुखर नहीं दिखाई देते। जैसे ये चुनाव के दौरान दिदी भूला करते हैं। ऐसा क्या है कि ये नेता जो अपने आप को उत्तराखंड का वोट तो ले जाते हैं. या बीजेपी को दिलाते हैं लेकिन केशव नेगी के मामले पर नहीं बोल रहे हैं, क्या इन लोगों को बोलना नहीं चाहिए या फिर इनको उत्तराखंड और पहाड़ के लोग सिर्फ चुनाव में याद आते हैं.. फिर उसके चाहे जो हो जाए तो सवाल अब सिर्फ केशव नेगी के मामले का नहीं है, सवाल उन जनप्रतिनिधियों की भूमिका का भी है जो खुद को उत्तराखंड और पहाड़ी समाज का प्रतिनिधि बताते हैं। चुनाव के समय जब वोट मांगने की बात आती है, तो पहाड़, पहचान और अपने समाज की आवाज सबसे आगे होती है, लेकिन जब उसी समाज से जुड़ा कोई संवेदनशील मामला सामने आता है, तो खामोशी क्यों छा जाती है?क्या जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी सिर्फ चुनावी मंचों तक सीमित है? या फिर हर उस नागरिक की आवाज उठाना भी उनकी भूमिका का हिस्सा है, जिसे वे अपना वोट बैंक मानते हैं?क्या केशव नेगी जैसे मामलों में खुलकर बोलना और निष्पक्ष जांच की मांग करना एक राजनीतिक विकल्प है, या फिर एक नैतिक जिम्मेदारी?और सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या उत्तराखंड के लोग सिर्फ चुनाव के वक्त याद आते हैं, या फिर हर मुश्किल घड़ी में उनकी आवाज बनना भी उतना ही जरूरी है?इन्हीं सवालों के साथ अब बहस तेज है फैसला जनता के हाथ में है कि वह अपने प्रतिनिधियों से सिर्फ वादे चाहती है या फिर जिम्मेदारी भी।