Veer Gatha पेशावर की खूनी दोपहर का वो सच| Veerchandra Garhwali | Independenceday | Uttarakhand News

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दोस्तो एक सैनिक के लिए उसकी वर्दी की कसम और उसके कमांडर का हुक्म सबसे पवित्र होता है। फौजी कभी अपने कदम पीछे नहीं खींचता। लेकिन क्या हो जब एक गोरा अंग्रेज अफसर उसी फौजी को अपनी ही माटी के निहत्थे, बेकसूर और शांत भाई-बहनों के सीने को गोलियों से छलनी करने का हुक्म दे दे? दोसतो बताऊंगा आपको उत्तराखंड एक वीर कहानी पेशावर की उस खूनी दोपहर का वो सच, जो इतिहास की किताबों ने छिपाया गया। शाही फौज की नौकरी लात मार बनने वाले इस बागी की पूरी दास्तान! दोस्तो आज से ठीक 96 साल पहले, 23 अप्रैल 1930 को पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में कुछ ऐसा ही हुआ था। ब्रिटिश कैप्टन रिकेट हाथ में पिस्तौल लहराते हुए चिल्ला रहा था—’फायर, शूट देम ऑल!’ अंग्रेज सैनिकों की उंगलियां ट्रिगर पर थीं। लेकिन तभी, रॉयल गढ़वाल राइफल्स की टुकड़ी के आगे खड़े एक हवलदार मेजर ने अपनी मूंछों पर ताव दिया, कैप्टन की आंख में आंख डाली और पूरी ताकत से दहाड़ा—’गढ़वाली सीज फायर! हम निहत्थों पर गोली नहीं चलाते!’ ये ऐतिहासिक आवाज थी देवभूमि के अमर सपूत वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की! एक ऐसा फौजी जिसने देश के स्वाभिमान के लिए अपनी नौकरी, अपनी पेंशन और अपनी जान की बाजी लगा दी थी। आज जब देश आजादी का जश्न मना रहा है तब देवभूमि के इस महानायक की वो आक्रामक दास्तान, जो आपके भीतर देशभक्ति का बारूद भर देगी।

दोस्तो 25 दिसंबर 1891 को पौड़ी गढ़वाल के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे चंद्र सिंह भंडारी बचपन से ही निडर और साहसी थे, साल 1914 में जब प्रथम विश्व युद्ध छिड़ा, तो वे ब्रिटिश सेना की शान कही जाने वाली ‘रॉयल गढ़वाल राइफल्स’ में भर्ती हो गए। सेना की नौकरी के दौरान उन्होंने फ्रांस से लेकर मेसोपोटामिया तक, अंग्रेजों की तरफ से कई मोर्चों पर जंग लड़ी और अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया। अंग्रेज अफसर उनकी मुस्तैदी के कायल थे और यही वजह थी कि उन्हें जल्द ही प्रमोट करके हवलदार मेजर बना दिया गया। लेकिन चंद्र सिंह की आंखों में सिर्फ फौज का अनुशासन नहीं था, उनके दिल के किसी कोने में गुलामी की बेड़ियों को काटने की एक चिंगारी सुलग रही थी। यह चिंगारी तब धधक उठी, जब साल 1929 में उनकी मुलाकात साबरमती के संत महात्मा गांधी से हुई। दोस्तो अप्रैल 1930 का महीना था। देश भर में नमक सत्याग्रह की आग लगी थी। उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान यानी ‘सीमांत गांधी’ के नेतृत्व में ‘खुदाई खिदमतगार’ संगठन के हजारों पठान शांतिपूर्ण ढंग से अंग्रेजों का विरोध कर रहे थे।

दोस्तो अंग्रेजों को डर था कि अगर पठानों का यह आंदोलन बढ़ा, तो ब्रिटिश साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। आंदोलन को कुचलने के लिए कुख्यात अंग्रेज कैप्टन रिकेट ने रॉयल गढ़वाल राइफल्स की दो टुकड़ियों को पेशावर कूच करने का आदेश दिया। 23 अप्रैल की वो तपती दोपहर थी, जब किस्सा ख्वानी बाजार हजारों निहत्थे पठानों और क्रांतिकारियों से खचाखच भरा हुआ था। तभी अचानक कैप्टन रिकेट ने बिना किसी चेतावनी के गढ़वाली सैनिकों को सीधे भीड़ पर अंधाधुंध गोलाबारी करने का क्रूर आदेश सुना दिया। दोस्तो कैप्टन रिकेट चिल्लाया— ‘फायर!’ लेकिन तभी इतिहास ने एक करवट ली। टुकड़ी की कमान संभाल रहे चंद्र सिंह गढ़वाली ने देखा कि सामने खड़े लोग कोई दुश्मन नहीं, बल्कि उनके अपने ही देश के निहत्थे भाई हैं। उन्होंने तुरंत कैप्टन के आदेश को हवा में उड़ाया और कड़कती बिजली जैसी आवाज में अपनी पलटन को हुक्म दिया—’गढ़वाली सीज फायर! बंदूकें नीचे करो!’ दोस्तो कैप्टन रिकेट सन्न रह गया। उसने गुस्से में चिल्लाकर पूछा—’व्हाट इज दिस भंडारी?’ चंद्र सिंह ने अपनी संगीन आगे बढ़ाई। संगीन मतबल बंदूक की नली पर आगे लगने वाली नूकीली चीज और गोरे अफसर की छाती के पास ले जाकर कहा—’हम भारत मां के बेटे हैं, फौज की नौकरी देशवासियों के कत्लेआम के लिए नहीं की है। हम निहत्थों पर गोली नहीं चलाएंगे।’ दोस्तो पूरी की पूरी गढ़वाली पलटन ने अपनी बंदूकें जमीन पर डाल दीं। यह ब्रिटिश भारतीय सेना के इतिहास का सबसे बड़ा, पहला और सबसे साहसिक सैन्य विद्रोह था।

केदोस्तो इस खुली बगावत से ब्रिटिश हुकूमत पूरी तरह हिल गई थी। उन्हें डर सताने लगा कि अगर पूरी फौज बागी हो गई, तो उन्हें बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ेगा। चंद्र सिंह गढ़वाली समेत पूरी रेजिमेंट को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। अंग्रेज उन्हें सरेआम फांसी देना चाहते थे, लेकिन उत्तराखंड के महान बैरिस्टर मुकुंदीलाल ने पूरी ताकत झोंक दी और उनकी फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलवाया। दोस्तो, चंद्र सिंह गढ़वाली को 14 साल तक एबटाबाद, डेरा इस्माइल खान और बरेली जैसी जेलों की कालकोठरियों में रखा गया। उन्हें भूखा रखा गया, कोड़ों से पीटा गया, उनका घर-बार सब जब्त कर लिया गया, लेकिन दोस्तो देवभूमि का ये शेर कभी नहीं रोया। 1947 में जब देश आजाद हुआ, तो महात्मा गांधी ने खुद कहा था कि ‘अगर हमारे पास एक और चंद्र सिंह गढ़वाली होता, तो हम बहुत पहले आजाद हो गए होते’ दोस्तो 1 अक्टूबर 1979 को इस महान नायक ने अंतिम सांस ली, लेकिन उनका वो एक डायलॉग—’हम निहत्थों पर गोली नहीं चलाते’—आज भी हर भारतीय सेना के जवान के भीतर न्याय और मानवता की अलख जगाता है। स्वतंत्रता दिवस के इस पावन मौके पर देवभूमि के ऐसे वीर सपूत को हमारा शत-शत नमन। इस वीर गाथा पर आपकी क्या रा\य है? कमेंट में जय हिंद जरूर लिखें।