ग्रामीण महिलाओं पर ये कैसी सख्ती? | Chamoli | Forest Fire | DFO | Uttarakhand News

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तो क्या पहाड़ की महिलाओं को अब जंगल जाने से भी डरना पड़ेगा? क्या जो महिलाएं वर्षों से अपने पशुओं के लिए चारा और ईंधन जुटाने जंगलों पर निर्भर हैं, उन्हीं पर अब कार्रवाई की तलवार लटकाई जा रही है? चमोली में वन विभाग की चेतावनी के बाद बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। एक तरफ जंगलों में आग बुझाने के लिए ग्रामीणों से सहयोग मांगा जा रहा है, दूसरी तरफ ग्रामीणों का कहना है कि जब वे जंगल में चारा लेने जाते हैं तो उन पर मुकदमे दर्ज किए जाते हैं। आखिर पहाड़ की महिलाएं करें तो क्या करें? जंगल बचाने वालों पर सख्ती क्यों? और क्या वन विभाग की नीतियां जमीनी हकीकत से दूर होती जा रही हैं? इसी मुद्दे पर देखिए हमारी यह खास रिपोर्ट। चमोली में वन विभाग का फरमान या पहाड़ी जीवन पर सवाल? — डीएफओ के आदेश पर कैसे उठे तीखे सवाल बताउंगा आपको इस लिए वीडियो को अंत तक जरूर देखिएगा दोस्तो मै इस खबर में आगे बड़ों उससे पहले एक बयान सुनाना चाहता हूं। इस बयान में बांकि तो सब मुझे ठीक लगा लेकिन लास्ट वाले पार्ट में जब बात जंगलों में आग बुझाने की आई तो आम ग्रामीण लोगों पर कौन सा कानून थोपा जा रहा है वो आप खुद देखिए। तो सुना आपने दोस्तो चमोली जिले में जंगलों की आग को लेकर केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग के डीएफओ सर्वेश कुमार दूबे की सख्त टिप्पणी और निर्देशों के बाद एक नई बहस शुरू हो गई है। एक तरफ प्रशासन जंगलों को आग से बचाने के लिए सख्त कदम उठाने की बात कर रहा है, तो दूसरी तरफ पहाड़ी ग्रामीण और खासकर महिलाएं खुद को लगातार दबाव और डर के बीच महसूस कर रही हैं हालांकि दोस्तो प्रशासन कुछ करे या ना करें कई क्षेत्रों में मौसम ने मेहरबानी की। जहां जंगल धधक रहे थे वहां आग पर काबू पाने में मददत कुदरत ने कर दी। लेकिन डीएफओ सर्वेश कुमार कहते हैं कि अगर गांव के लोगों ने आग बुझाने में मदद नहीं की तो मुकदमा दर्ज होगा, फलां फलां धारा में इसका प्रावधान है। तो दोस्तो मै डीएफओ साहस से ये पूछना चाहता हूं वैसे तो पूरा उत्तराखंड का पहाड़ी क्षेत्र पूछ रहा है। जंगलो में भड़कती आग पर काबू पाने जब वन विभाग नाकाम दिखाई देता है तो उन पर कौन सी धारा में कार्रवआई का प्रावधान है। अगर ग्रामीण लोगों के लिए जीवन देने वाले जंगल ही खतरा बन बैठे हों तो जैसे आग से होता नुकसान जंगली जानवरों से होती जन हानी तो इस डीएफओ के खिलाफ कौन सी धारा लगाई जाती है ये बताना चाहिए, ना तब बात बने।

दरअसल दोस्तो डीएफओ की ओर से हुई बैठक में वन अधिकारियों और कर्मचारियों को साफ निर्देश दिए गए कि जंगल में आग लगने की सूचना मिलते ही तुरंत मौके पर पहुंचकर नियंत्रण की कार्रवाई की जाए। साथ ही जरूरत पड़ने पर ग्रामीणों का सहयोग भी लिया जाए, ताकि आग पर समय रहते काबू पाया जा सके लेकिन इसी निर्देश के साथ जो सबसे बड़ा विवाद सामने आया, वह है चेतावनी का स्वरूप। डीएफओ ने कहा कि यदि ग्रामीण वनाग्नि रोकने और आग बुझाने में सहयोग नहीं करते हैं तो उनके खिलाफ वन अधिनियम की धारा-79 के तहत मुकदमा दर्ज किया जाएगा। इस प्रावधान में एक साल तक की सजा और जुर्माने का भी उल्लेख है। दोस्तो यही बात अब पहाड़ में चर्चा का विषय बन गई है। ग्रामीणों का कहना है कि एक तरफ उनसे जंगल बचाने में सहयोग की अपेक्षा की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जब महिलाएं जंगल में चारा, घास और ईंधन लेने जाती हैं, तो उन पर भी कार्रवाई की तलवार लटकती है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या पहाड़ की महिलाओं और ग्रामीणों को इस तरह की सख्ती से नियंत्रित करना समाधान है? क्या दशकों से जंगल और गांव के बीच संतुलन बनाए रखने वाली स्थानीय व्यवस्था को सिर्फ कानून और मुकदमों के डर से चलाया जा सकता है? वैसे दोस्तो इस बीच एक तस्वीर मुझे 2022 की याद याती है, वो तस्वीर क्या थी।

दोस्तो ये 15 जुलाई 2022 का हेलंग (जोशीमठ के पास) का मामला याद कर रहे हैं, जहां जंगल में घास काटने गई महिलाओं के साथ विवाद हुआ था और उन पर जुर्माना भी लगाया गया था। यह घटना आज भी लोगों के मन में एक बड़ा सवाल छोड़ती है। सवाल यह है कि आखिर पहाड़ की महिलाएं और ग्रामीण जाएं तो जाएं कहाँ? एक तरफ जंगल उनकी आजीविका हैं, दूसरी तरफ वही जंगल उनके लिए कार्रवाई का कारण बन जाते हैं। दोस्तो वन संरक्षण जरूरी है, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि स्थानीय लोगों की जीवन-व्यवस्था और उनकी वास्तविक जरूरतों को समझकर संतुलित नीति बनाई जाए। आज जरूरत इस बात की है कि जंगल और गांव के बीच भरोसा और सहयोग का रिश्ता मजबूत हो, न कि डर और टकराव का इधर दोस्तो ग्रामीणों का यह भी कहना है कि जंगलों की आग एक गंभीर समस्या है, लेकिन इसका बोझ पूरी तरह स्थानीय लोगों पर डालना उचित नहीं है। आग की रोकथाम के लिए संसाधन, स्टाफ और तकनीक की भी जिम्मेदारी उतनी ही जरूरी है जितनी ग्रामीण सहयोग की, लेकिन इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या पहाड़ी जीवन की वास्तविकताओं को समझे बिना केवल सख्त आदेशों से समाधान निकल सकता है? और क्या गांव की महिलाओं, जो सदियों से जंगल पर निर्भर रही हैं, उन्हें केवल डर और कार्रवाई के दायरे में देखना न्यायसंगत है? चमोली का यह विवाद अब केवल वनाग्नि का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि पहाड़ की जिंदगी, जंगल और प्रशासन के बीच संतुलन की बड़ी बहस बन चुका है।