दोस्तो, उत्तराखंड के जंगल इन दिनों आग की लपटों में घिरे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर इन जंगलों को बचाने वाले लोग खुद कितने सुरक्षित हैं?चमोली से सामने आई दर्दनाक घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। जंगल की आग बुझाने गए एक फायर वॉचर की चट्टान से गिरकर जान चली गई और अब इस हादसे के बाद लोगों का गुस्सा वन विभाग के खिलाफ फूट पड़ा है। आखिर क्या है ये पूरा मामला कैसे उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग अब चुका है जानलेवा बताउंगा आपको पूरी खबर अपनी इस रिपोर्ट के जरिए। दोस्तो जैसा की आप सब लोग देख रहे होंगे उत्तराखंड के जंगल के जंगल आग में राख हो रहे हैं,मै आपको ये पूरी खबर बताउं उससे पहले कुछ सवाल हैं। जैसे क्या फायर वॉचरों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण दिए जाते हैं? क्या दुर्गम पहाड़ों में आग बुझाने भेजे जाने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर कोई ठोस व्यवस्था है? और अगर नहीं तो आखिर कब तक ऐसे ही जान जोखिम में डालकर कर्मचारी जंगल बचाते रहेंगे? दोस्तो, उत्तराखंड में हर साल जंगलों में आग लगती है। हर साल फायर वॉचर और वन कर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर आग बुझाने निकलते हैं, लेकिन जब हादसा होता है, तो जिम्मेदारी कौन लेता है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि वन विभाग कर्मचारियों से बिना पर्याप्त संसाधनों और सुरक्षा इंतजामों के काम करा रहा है। इसी वजह से अब लोगों में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। क्या जंगल बचाने वालों की जिंदगी इतनी सस्ती है?और क्या इस हादसे के बाद सिस्टम जागेगा या फिर अगली गर्मियों में कोई और फायर वॉचर इसी तरह जान गंवाएगा?
जी हां दोस्तो उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों के जंगलों में लगातार बढ़ रही आग की घटनाओं के बीच एक दर्दनाक हादसा सामने आया है। बदरीनाथ वन प्रभाग क्षेत्र के बिरही के पास जंगल की आग बुझाने गए एक फायर वॉचर की चट्टान से गिरकर जिंदगी खत्म हो गई। घटना के बाद परिजनों और ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। नाराज लोगों ने वन विभाग के अधिकारियों का घेराव करते हुए मृतक के परिवार को उचित मुआवजा और पत्नी को नौकरी देने की मांग उठाई है। दोस्तो इन दिनों उत्तराखंड के कई पर्वतीय जिलों के जंगलों में आग धधक रही है। चमोली जिले के कुछ वन क्षेत्र भी आग की चपेट में हैं, जिससे वातावरण में धुंध का असर दिखाई दे रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वन विभाग आग पर काबू पाने में नाकाम साबित हो रहा है और फायर वॉचरों को बिना पर्याप्त संसाधनों के जोखिम भरे हालात में काम करना पड़ रहा है। घटना के मुताबिक, वन विभाग की टीम बिरही क्षेत्र में जंगल की आग बुझाने पहुंची थी। इसी दौरान फायर वॉचर 43 वर्षीय राजेंद्र सिंह पुत्र नंदन सिंह निवासी पाखी-जलग्वाड़, बदरीनाथ आग बुझाने के दौरान चट्टान से गिर गए, सूचना मिलने के बाद वन विभाग के अधिकारी और परिजन मौके पर पहुंचे। बताया जा रहा है कि राजेंद्र सिंह पिछले 8 वर्षों से वन विभाग के साथ फायर वॉचर के रूप में कार्य कर रहे थे और परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे। वहीं मै आपको थोड़ा ये भी बताता हूं कि क्या होता है फायर वॉचर दोस्तो वन विभाग जंगलों में आग की घटनाओं को रोकने और नियंत्रण के लिए ग्रामीण स्तर पर अस्थाई रूप से फायर वॉचर नियुक्त करता है। ये कर्मचारी केवल फायर सीजन के दौरान कार्य करते हैं और इन्हें लगभग 8 से 10 हजार रुपए तक मानदेय दिया जाता है। अब इधर दोस्तो परिजनों का कहना है कि राजेंद्र सिंह के निधन के बाद परिवार आर्थिक संकट में आ गया है। उन्होंने सरकार से उचित मुआवजा और मृतक की पत्नी को नौकरी देने की मांग की है, ताकि परिवार का पालन-पोषण और बच्चों की पढ़ाई जारी रह सके।
दोस्तो यहां एक जानकारी ये भी कि फायर वॉचर स्थायी कर्मचारी नहीं होते और उन्हें केवल तीन महीने के फायर सीजन के लिए तैनात किया जाता है। विभाग की ओर से उनका जोखिम बीमा कराया जाता है। दुर्घटना की स्थिति में बीमा के तहत लगभग 10 लाख रुपए तक की सहायता राशि दी जा सकती है। परिवार के एक सदस्य को अस्थाई नौकरी देने का आश्वासन भी दिया गया है तो दोस्तो यहां मै आपको ये भी बता दूं कि सरकार ने फायर वॉचर तो नियुक्त किए हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। भीषण जंगल की आग के बीच वन कर्मी और फायर वॉचर बिना संसाधनों के जान जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं। सरकार को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। दोस्तो, फिलहाल उत्तराखंड के जंगल सिर्फ जल नहीं रहे, बल्कि अब जान भी ले रहे हैं। चमोली में जंगल की आग बुझाने गए एक फायर वॉचर की दर्दनाक कहानी ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।आखिर कब तक जंगल बचाने वाले कर्मचारी बिना सुरक्षा के अपनी जान जोखिम में डालते रहेंगे?क्या फायर वॉचरों की जिंदगी की कीमत सिर्फ कुछ हजार रुपये मानदेय तक ही सीमित है? और क्या हर साल ऐसे हादसों के बाद भी सिस्टम सिर्फ आश्वासन देता रहेगा? दोस्तो, उत्तराखंड में हर साल गर्मियों के दौरान जंगलों में आग लगती है और इन्हीं आग की लपटों के बीच फायर वॉचर अपनी जान की परवाह किए बिना जंगल बचाने निकल पड़ते हैं। लेकिन दुख की बात ये है कि जिन लोगों के भरोसे जंगलों को बचाया जाता है, उनकी सुरक्षा के इंतजाम आज भी बेहद कमजोर हैं।