उत्तराखंड में आग से भारी नुकसान! | Forest Fire | Wld Fire | Ranikhet | Uttarkashi | Uttarakhand News

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दोस्तो, उत्तराखंड फिर जल रहा है। पहाड़ों के जंगल धधक रहे हैं, पेड़ राख हो रहे हैं और सवाल ये है कि आखिर हर साल जंगलों में आग लगती क्यों है? क्या ये सिर्फ गर्मी और सूखे का असर है? या फिर इन आग की लपटों के पीछे इंसानी लापरवाही और साजिश छिपी है?सिर्फ तीन महीनों में उत्तराखंड में जंगलों में आग लगने की 300 घटनाएं रिकॉर्ड हो चुकी हैं और करीब 239 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर राख हो गया है। सोचिए जिस जंगल को तैयार होने में दशकों लगते हैं वो कुछ घंटों की आग में खत्म हो रहा है। क्या उत्तराखंड के जंगल हर साल इसी तरह जलते रहेंगे?क्या सिर्फ आग बुझाने की कवायद होती रहेगी?या फिर कभी उन लोगों पर भी कार्रवाई होगी जो इन जंगलों को राख में बदल रहे हैं?आज मै आपको दिखाउंगा उत्तराखंड के जंगलों में आग के उसी भयावह तांडव की तस्वीरें जिसने एक बार फिर पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दोस्तो, उत्तराखंड के जंगल एक बार फिर धधक रहे हैं, पहाड़ जल रहे हैं, पेड़ राख हो रहे हैं और रात के अंधेरे में जान जोखिम में डालकर फायर सर्विस की टीमें आग से जंग लड़ रही हैं। रानीखेत से सामने आई ये तस्वीरें सिर्फ एक आग की नहीं बल्कि उस संकट की हैं, जो हर साल गर्मियों में उत्तराखंड को झुलसा देता है। कैसे दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच फायर फाइटर्स पूरी रात आग बुझाने में जुटे रहे। कहीं पानी पहुंचाने का रास्ता नहीं, कहीं वाहन नहीं पहुंच सकते। ऐसे में जवान पेड़ों की टहनियों और हाथों के सहारे आग पर काबू पाने की कोशिश करते नजर आए।दोस्तो, जंगलों में लगी आग सिर्फ पेड़ों को नहीं जलाती ये पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है. वन्यजीवों का जीवन खतरे में डालती है और पहाड़ के गांवों तक को संकट में डाल देती है। सबसे बड़ी चिंता की बात ये है कि हर साल आग लगती है, हर साल हजारों हेक्टेयर जंगल जल जाते हैं लेकिन इसके पीछे की असली वजह आज भी पूरी तरह सामने नहीं आ पाती।कहीं लापरवाही। कहीं जानबूझकर लगाई गई आग, तो कहीं सूखी गर्म हवाएं वजह चाहे जो भी हो, लेकिन नुकसान पूरा उत्तराखंड झेलता है। इस बार भी पिछले कुछ दिनों में कई इलाकों से जंगलों में आग लगने की घटनाएं सामने आई हैं। जब हम रात में अपने घरों में सुरक्षित सो रहे होते हैं, तब ये फायर सर्विस और वन विभाग की टीमें पहाड़ों के बीच धुएं और आग के बीच खड़ी होती हैं ताकि जंगल बच सकें और लोगों की जिंदगी सुरक्षित रह सके।

फिलहाल रानीखेत का ये वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और लोग इन जवानों की मेहनत और साहस को सलाम कर रहे हैं। दोस्तो, उत्तराखंड के जंगल एक बार फिर धधक उठे हैं, बारिश थमी नहीं कि पहाड़ों पर आग की लपटें दिखाई देने लगीं। उत्तरकाशी के पास से सामने आया ये वीडियो बेहद चिंताजनक है। जहां दूर-दूर तक जंगल आग की चपेट में नजर आ रहे हैं।हर साल गर्मियों में उत्तराखंड से ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जंगल सुलगते हैं। धुआं आसमान में फैल जाता है, पेड़-पौधे राख हो जाते हैं और सबसे ज्यादा असर पड़ता है वन्यजीवों पर। जिन जंगलों में जानवर सुरक्षित रहते हैं। वही जंगल अब उनके लिए खतरा बनते जा रहे हैं। लेकिन दोस्तो, सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है आखिर जंगलों में आग लगाता कौन है?क्या ये सिर्फ गर्मी और सूखे की वजह से होता है? या फिर इसके पीछे इंसानी लापरवाही और जानबूझकर लगाई गई आग जिम्मेदार है? हर साल वन विभाग जांच की बात करता है, कई बार टीमों का गठन होता है, लेकिन आज तक ये पहेली पूरी तरह नहीं सुलझ पाई कि आखिर इन आग की घटनाओं के पीछे कौन लोग हैं। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पहाड़ी राज्य में जंगल सिर्फ हरियाली नहीं हैं, ये यहां की जिंदगी हैं, पानी के स्रोत हैं। मौसम का संतुलन हैं और लाखों लोगों की आजीविका का आधार भी हैं। लेकिन जब यही जंगल आग में जलते हैं, तो उसका असर सिर्फ पेड़ों तक सीमित नहीं रहता। पर्यावरण, वन्यजीव और इंसानों तक सब प्रभावित होते हैं।आप वीडियो में देख सकते हैं कि आग कितनी तेजी से पहाड़ी ढलानों में फैल रही है। सूखी घास और तेज हवाएं आग को और भड़काने का काम कर रही हैं। स्थानीय लोग और वन विभाग की टीमें लगातार आग पर काबू पाने की कोशिश में जुटी हैं, लेकिन दुर्गम पहाड़ी इलाकों में आग बुझाना आसान नहीं होता।

दोस्तो, हर साल करोड़ों रुपये जंगल बचाने में खर्च होते हैं फिर भी हालात नहीं बदलते। सवाल ये है कि क्या सिर्फ आग बुझाना ही समाधान है या फिर आग लगाने वालों तक पहुंचना भी जरूरी है?फिलहाल उत्तरकाशी के पास का ये वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और एक बार फिर जंगलों में आग की घटनाओं को लेकर बहस तेज हो गई है। उत्तराखंड में एक बार फिर जंगल धधक रहे हैं। हरियाली और ठंडी हवा का सुकून देने वाली पहाड़ों की वादियां आग की लपटें और धुएं का गुबार दे रही है। राज्य में फायर सीजन शुरू होने के बाद से वनाग्नि की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। हालात ऐसे हैं कि गढ़वाल से कर कुमाऊं तक कई जिलों के जंगल आग की चपेट में आ चुके हैं.वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 15 फरवरी से अभी तक प्रदेश में 300 वनाग्नि की घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें करीब 239.47 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र जलकर राख हो चुका है। वन विभाग और मौसम विभाग दोनों ही इस बार के फायर सीजन को बेहद संवेदनशील मान रहे हैं। लगातार बढ़ता तापमान, लंबे समय से बारिश न होना और सूखी वनस्पति ने जंगलों को बारूद की तरह ज्वलनशील बना दिया है.गढ़वाल के जंगलों में सबसे ज्यादा आग: इस बार सबसे ज्यादा वनाग्नि की घटनाएं गढ़वाल मंडल में दर्ज की गई हैं। पौड़ी, टिहरी, रुद्रप्रयाग, चमोली और उत्तरकाशी के जंगल लगातार आग की चपेट में आए हैं। कई इलाकों में रात के समय पहाड़ों पर आग की लंबी लपटें दूर-दूर तक दिखाई दे रही हैं। जंगलों में उठता धुआं अब रिहायशी इलाकों तक पहुंचने लगा है, जिससे स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ गई है। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, गढ़वाल क्षेत्र में कई जगह आग इतनी तेजी से फैली कि उसे नियंत्रित करने में घंटों लग रहे हैं। कठिन पहाड़ी इलाके और दुर्गम रास्तों के कारण फायर टीमों को मौके तक पहुंचने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कई स्थानों पर कर्मचारियों को घंटों पैदल चलकर जंगलों तक पहुंचना पड़ रहा है।

वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, सबसे ज्यादा प्रभावित वन प्रभागों में डीएफओ गढ़वाल, पिथौरागढ़, बदरीनाथ, कालसी और रुद्रप्रयाग क्षेत्र शामिल है। इन इलाकों में कई हेक्टेयर वन भूमि आग की भेंट चढ़ चुकी है। उत्तराखंड में इस बार मौसम की बेरुखी भी जंगलों के लिए बड़ी मुसीबत बन गई है। मौसम विभाग के अनुसार, पिछले कई दिनों से प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में बारिश नहीं हुई है। लगातार तेज धूप और गर्म हवाओं ने जंगलों की नमी खत्म कर दी है, मौसम वैज्ञानिक रोहित थपलियाल के मुताबिक, पर्वतीय क्षेत्रों में हल्की बारिश की संभावना जरूर है. लेकिन उससे बड़े स्तर पर राहत मिलने की उम्मीद कम है। मैदानी जिलों में गर्मी और अधिक बढ़ सकती है। ऐसे में वनाग्नि की घटनाएं आने वाले दिनों में और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। आखिर क्यों बार बार जलते हैं उत्तराखंड के जंगल: गर्मी के सीजन में उत्तराखंड में जंगलों में आग लगना कोई नई बात नहीं है। लेकिन हर साल इसका दायरा बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारण जिम्मेदार हैं। राज्य के बड़े हिस्से में चीड़ के जंगल फैले हुए हैं। चीड़ के पेड़ों से निकलने वाला लीसा अत्यधिक ज्वलनशील होता है। गर्मियों में जब जंगल सूख जाते हैं तो यही लीसा और सूखी पत्तियां आग को तेजी से फैलाने का काम करती हैं। इसके अलावा मानव गतिविधियां भी आग की बड़ी वजह बन रही है। जंगलों से गुजरने वाले लोग बीड़ी, सिगरेट या जलती माचिस फेंक देते हैं, जिससे आग लग जाती है। कई बार ग्रामीण नई घास उगाने के उद्देश्य से जंगलों में आग लगा देते है, लेकिन यही आग बाद में बेकाबू होकर बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेती है। वन अधिकारियों का कहना है कि, जलवायु परिवर्तन भी अब वनाग्नि की घटनाओं को बढ़ाने वाला बड़ा कारण बन चुका है। समय पर बारिश नहीं होने से जंगलों में नमी कम हो रही है और तापमान बढ़ने से आग तेजी से फैल रही है। 15 फरवरी से शुरू हुए फायर सीजन में अब तक करीब 239.47 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र जल चुका है। इसके अलावा लगभग 3.5 हेक्टेयर पौधरोपण क्षेत्र भी प्रभावित हुआ है।

वन विभाग के अनुसार, कई स्थानों पर नए लगाए गए हजारों पौधे आग में नष्ट हो गए हैं। चमोली जिले के नारायणबगड़ क्षेत्र में लगी भीषण आग ने वन विभाग की चिंताएं बढ़ा दी हैं। यहां पश्चिमी पिंडर रेंज और बदरीनाथ वन प्रभाग के जंगलों में लगातार दो दिनों तक आग धधकती रही। आग की चपेट में आने से हजारों छोटे पौधे जलकर राख हो गए। रानीखेत से सामने आए एक वीडियो ने जंगलों में आग बुझाने की कठिन हकीकत को उजागर भी किया। वीडियो में फायर सर्विस और वन विभाग की टीमें दुर्गम पहाड़ियों में रातभर आग बुझाती नजर आईं। कई जगह सड़क और वाहन पहुंचने का रास्ता नहीं होने के कारण कर्मचारियों को पेड़ों की टहनियों से आग बुझानी पड़ी. घना जंगल, अंधेरा और ऊबड़-खाबड़ रास्ते राहत कार्य में बड़ी चुनौती बने हुए हैं। कई बार आग इतनी तेजी से फैलती है कि कर्मचारियों को अपनी जान जोखिम में डालकर काम करना पड़ता है। जिले के बुआखाल और पौड़ी-देवप्रयाग मोटर मार्ग के आसपास जंगलों में भीषण आग देखने को मिली रही है। आग की लपटें सड़क किनारे जंगलों से लेकर ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक फैल रही है। दूर-दूर तक धुएं का गुबार दिखाई दे रहा है। इसी तरह चमोली जिले के कई गांवों के जंगल भी आग की चपेट में आ गए हैं। कौब, लेगुना, केशपुर, छैकुड़ा और नलगांव क्षेत्र में जंगल जल रहे हैं। वन विभाग की टीमों ने घंटों मशक्कत के बाद आग पर नियंत्रण पाने की कोशिश की। इस आग से लगातार वन्यजीव भी प्रभावित हो रहे हैं। जंगली जानवर पानी और सुरक्षित स्थान की तलाश में आबादी की ओर आने लगे हैं। जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा भी बढ़ रहा है। वन विभाग हाई अलर्ट पर है वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए वन विभाग ने प्रदेशभर में हाई अलर्ट जारी किया है। विभाग की ओर से 1438 फॉरेस्ट फायर स्टेशन सक्रिय किए गए हैं।

इसके अलावा, करीब 5600 फॉरेस्ट फायर वॉलेंटियर भी आग बुझाने के काम में लगाए गए हैं। राज्य में लगभग 40 मास्टर फायर कंट्रोल रूम बनाए गए हैं, जहां से लगातार निगरानी की जा रही है। दोस्तो वन विभाग का दावा है कि हर सूचना पर तुरंत टीमों को रवाना किया जा रहा है। दोस्तो इससे पहले 17 मई रविवार को आग से सामना गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी का भी हुआ था. उनका एक वीडियो खूब वायरल भी हुआ। मामला तब का है जब वे पौड़ी से कोटद्वार लौट रहे थे। तभी रास्ते में उन्हें जंगलों में भीषण आग लगी दिखाई दी। इस पर उन्होंने वहीं से खड़े होकर वन विभाग के अधिकारियों से फोन पर संपर्क कर आग पर जल्द से जल्द काबू पाने की बात कही, तो क्या आने वाले दिन और चुनौतीपूर्ण है ये सवाल इसलिए क्योंकि अगर अगले कुछ दिनों तक बारिश नहीं हुई तो उत्तराखंड में वनाग्नि की घटनाएं और विकराल रूप ले सकती हैं. तापमान लगातार बढ़ रहा है। जंगलों में नमी लगभग खत्म हो चुकी है। पर्यावरणविदों का कहना है कि, वनाग्नि सिर्फ जंगलों तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर वन्यजीवों, पर्यावरण, जल स्रोतों और लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। जंगलों में लगने वाली आग से बड़ी मात्रा में धुआं वातावरण में फैलता है, जिससे प्रदूषण बढ़ता है और पहाड़ी क्षेत्रों का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है। फिलहाल पूरा उत्तराखंड एक कठिन फायर सीजन से गुजर रहा है। वन विभाग, फायर सर्विस और स्थानीय लोग मिलकर आग बुझाने की कोशिशों में जुटे है, लेकिन मौसम का साथ न मिलने से चुनौती लगातार बढ़ती जा रही है।