Chamoli फौजी पिता की पुकार! सुन लो सरकार! | Justice For Shubhanshu | Soldier | Uttarakhand News

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दोस्तो देश की सीमाओं पर हर पल अपनी जान जोखिम में डालने वाला एक सैनिक, क्या उसे अपने ही देश में न्याय के लिए अदालतों और दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें? क्या एक फौजी की आवाज़ भी व्यवस्था तक नहीं पहुंच पा रही? क्या डेढ़ साल के अपने बेटे को खोने के बाद भी न्याय सिर्फ एक इंतज़ार बनकर रह गया है?और जब अदालत एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दे चुकी है, तो फिर कार्रवाई में देरी क्यों? बताउंगा आपको पूरी खबर कि कैसे अपने उत्तराखंड में इंसाफ मिलाता है उसका एक बड़ा उदाहरण लेकर आया हूं। दोस्तो यह कहानी है ये खबर, भारतीय सेना के जवान दिनेश चंद्र जोशी की। सीमा पर देश की सुरक्षा का दायित्व निभाने वाले इस सैनिक का आरोप है कि समय पर उचित इलाज न मिलने से उनके डेढ़ साल के बेटे शुभांशु की जान चली गई, लेकिन दोस्तो हैरानी की बात ये कि घटना को एक वर्ष बीत चुका है, लेकिन परिवार का कहना है कि न्याय की लड़ाई आज भी जारी है। ये पूरी खबर आपको चौका देगी और रुला देगी। दोस्तो उत्तराखंड में साल पहले एक साल के मासूम शुभांशु जोशी अचानक चले जाने ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। यह बच्चा एक फौजी का बेटा था। पिछले साल 10 जुलाई को लगातार उल्टी होने की वजह से शुभांशु की तबीयत अचानक खराब हो गई थी। ऐसे में परिवार के लोग इलाज के लिए उसे गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में ले गए थे। हॉस्पिटल में अच्छी सुविधा न होने की वजह से लगातार उसे एक हॉस्पिटल से दूसरे हॉस्पिटल रेफर किया जा रहा था। ऐसे में समय ज्यादा लगने की वजह से और सरकारी अस्पतालों में अच्छी सुविधा न होने की वजह से बच्चे की जान चली गई।

दोस्तो शुभांशु जोशी चमोली जिले के ग्वालदम गांव का रहने वाला था। परिवार के लोगों ने बताया कि जब शुभांशु ने खाना-पीना छोड़ दिया तो उसे इलाज के लिए गांव के सरकारी अस्पताल में ले जाया गया था, वहां इलाज के लिए जरूरी सुविधाएं नहीं थीं। ऐसे में अस्पताल वालों ने उसे 22 किलोमीटर दूर बागेश्वर जिले के बैजनाथ में स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में रेफर कर दिया था। जानकारी के मुताबिक, इजाल की उचित व्यवस्था न होने की वजह से शुभांशु को उत्तराखंड के 4 जिलों में स्थित 5 अलग-अलग अस्पतालों में रेफर किया गया था। इतना ही नहीं परिजनों का कहना है कि अदालत के निर्देश के बावजूद एफआईआर दर्ज होने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। वहीं, इस मामले में संबंधित पक्षों का पक्ष और कानूनी प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है, जिसकी जांच और कार्रवाई अपने स्तर पर चल रही है। दोस्तो बैजनाथ में स्थित सरकारी अस्पताल में शुभांशु का इलाज सही से नहीं हो पाया। ऐसे में हालात ज्यादा बिगड़ने पर डॉक्टरों ने उसे बागेश्वर के जिला अस्पताल भेज दिया, जो वहां से 20 किलोमीटर दूर है। वहां के डॉक्टरों ने बताया कि बच्चे के दिमाग में ब्लड का सर्कुलेशन सही से नही हो पा रहा है।

इस अस्पताल में बच्चों के लिए आईसीयू (PICU) की सुविधा नहीं थी और न ही वहां कोई हृदय रोग विशेषज्ञ (हार्ट स्पेशलिस्ट) मौजूद था। ऐसे में वहां भी बच्चे का ठीक से इलाज नहीं हो पाया। इसके बाद शुभांशु को अल्मोड़ा जिले के मेडिकल कॉलेज ले जाया गया, जो वहां से करीब 68 किलोमीटर दूर है लेकिन वहां भी पूरी तरह इलाज संभव नहीं हो पाया था। बाद में उसे हल्द्वानी जिले के सुशीला तिवारी अस्पताल में रेफर कर दिया गया था। उसी अस्पताल में 16 जुलाई को उसकी मौत हो गई थी। अब दोस्तो आगे की कहानी बड़ी झकझोर कर रख देगी, क्योंकि शुभांशु के पिता दिनेश जोशी ने जिला प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। दिनेश जोशी इस समय जम्मू-कश्मीर में पोस्टेड थे उन्होंने कहा कि जब उनकी पत्नी ने अल्मोड़ा के लिए एंबुलेंस मंगवाई तो वह समय पर नहीं आई थी। उन्होंने बताया कि शाम 7 बजे के करीब एंबुलेंस के लिए कॉल किया गया था लेकिन एक घंटे बाद भी एंबुलेंस वहां नहीं पहुंची थी। जब बहुत देर हो गई, तो उन्होंने खुद जिलाधिकारी से फोन करके मदद मांगी। तब जाकर रात 9:30 बजे एंबुलेंस आई। दोस्तो बच्चे की मां ने भावुक होकर बताया कि अस्पताल के स्टाफ ने उनकी तकलीफ को गंभीरता से नहीं लिया था। जब उन्होंने डॉक्टर से मदद मांगी और बताया कि उनके पति दूर हैं और वह अकेली हैं। उसके बाद भी उन्हें कहा गया कि वह खुद ही बच्चे को बड़े अस्पताल ले जाएं।

दोस्तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस घटना को बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। उन्होंने कहा कि शुरुआती जानकारी के आधार पर ऐसा लगता है कि कई स्तरों पर लापरवाही हुई है। उन्होंने कुमाऊं कमिश्नर को जांच के आदेश दिए हैं और कहा है कि अगर किसी भी स्तर पर लापरवाही पाई गई तो सख्त कार्रवाई की जाएगी, लेकिन दोस्तो एक साल बाद क्या हुआ बल। एक सैनिक देश की सीमाओं की रक्षा करता है, लेकिन अगर उसे अपने ही देश में न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़े, तो यह कई सवाल छोड़ जाता है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या अदालत के निर्देशों के अनुरूप समय पर कार्रवाई होगी?क्या शुभांशु के परिवार को न्याय मिलेगा?फिलहाल, यह सिर्फ एक परिवार की लड़ाई नहीं, बल्कि व्यवस्था से जवाब मांगता एक बड़ा सवाल है।