दोस्तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देवभूमि का दौरा और दौरे ठीक बाद जहां एक तरफ विकास की नई रफ्तार का दावा किया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ पहाड़ों की असल हकीकत एक बार फिर सामने आ गई है। दोस्तो ये थोड़ा कड़वा भी लग सकता है कुछ लोगों को, लेकिन दोस्तो एक्सप्रेसवे बनकर तैयार है, सफर तेज हो रहा है, दूरी घट रही है, लेकिन सवाल ये है कि क्या ये विकास पहाड़ के हर गांव तक पहुंच पाया है? जिस विकास आगामी चुनाव में जीत की चाबी बताया जा रहा है। मै आपको दो तस्वीरें अपनी इस रिपोर्ट में दिखाने जा रहा हूं, उन तस्वीरों पर आप भी सोचिएगा क्या सही है और क्या गलत। दोस्तो कुछ लोग कहेंगे कि कल तक में विकास इबारत लिख रही तस्वीरों की बात कर रहा था और अचानक आज ऐसा क्या हुआ कि मै ये आकलन करने के लिए आ गया कितन विकास और क्या इसकी रफ्तार इतनी तेज है कि वो चमोली के उस क्षेत्र तक पहुंच सके जहां से मै आपको तस्वीर दिखाने जा रहा हूं। दोस्तो जब सड़कें चमक रही हैं, तो क्या पहाड़ों के अंतिम गांव अब भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं? और सबसे बड़ा सवाल—क्या यही है असली विकास, या फिर विकास और हकीकत के बीच अब भी एक बड़ी खाई बाकी है?जहां सामने आएंगे कुछ ऐसे सवाल, जो सोचने पर मजबूर कर देंगे।मोदी का दून में रोड शो और ये बीमार महिला की।
ये दोनों तस्वीरें अपने आप में इतना कुछ समेटे हुई हैं कि मै अगर बात करने बैठु ना जाने कितना वक्त लग जाएगा, लेकिन आज में इन तस्वीरों को लेकर बात करने जा रहा हूं। दोस्तो आप सबको मुझे भी नए बने एक्सप्रेसवे के लिए बधाई ये एक बड़ी परियोजना है और निश्चित रूप से कनेक्टिविटी, पर्यटन और व्यापार को बेहतर बनाएगी, लेकिन दोस्तो इस तस्वीर पर क्या कहेंगे। दोस्तो जहां हमने हमारी सरकारों ने डबल इंजर का जोर लगाया तो दिल्ली से देहरादून की दूरी तक कम कर दी, लेकिन क्या इस डबल इंजन में इतनी ताकत है कि सरकार और जनता के बीच की दूरी कम कर दे। क्या दानों में इतना दम है कि आम जन की जिंदगी और अपस्पताल की दूरी भी कम हो जाए। दोस्तो मै आपको इस तस्वीर में क्या बताउं वैसे ये तस्वीर अपनी बाते अपनी कहानी बया कर रही है लेकिन इस तस्वीर से ज्यादा जरूरी लोगों के लिए सियायासत के लिए ये वाली है। जी हां शायद हो रहा होगा ऐसा लेकिन यहां मुझे नहीं लगा हुआ होगा। दोस्तो ये भाषण देश के प्रधानमंत्री मोदी का बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन एक उतना ही महत्वपूर्ण सवाल भी है। जब डुमक जैसे गांव में 70 वर्षीय जशोदा देवी को अस्पताल तक पहुंचने के लिए 8 किलोमीटर तक कंधों पर ढोकर ले जाना पड़े, तो यह विकास आखिर किस तक पहुंच रहा है? दोस्तो एक तरफ एक्सप्रेसवे से मिनटों का सफर बचाया जा रहा है। दूसरी तरफ पहाड़ों में लोग आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचने के लिए घंटों और कभी-कभी दिनों तक संघर्ष कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री पर्यटन और व्यापार की बात करते हैं, और यह पूरी तरह उचित है, लेकिन क्या पहाड़ों के लोग केवल पर्यटन का हिस्सा हैं, या उनकी गरिमापूर्ण जीवन जीने की बुनियादी जरूरत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है? आप एक्सप्रेसवे बनाइए, बिल्कुल बनाइए। लेकिन यह भी सुनिश्चित कीजिए कि किसी को अभी भी जीवन बचाने के लिए कंधों पर न ढोना पड़े, आखिर कब बदलेगी पहाड़ की यह तस्वीर। चमोली के दूरस्थ डुमक गांव में 70 वर्षीय जशोदा देवी की तबीयत बिगड़ने पर ग्रामीणों को उन्हें 8 किलोमीटर तक डंडी के सहारे कंधों पर उठाकर सड़क तक पहुंचाना पड़ा। यह पहाड़ की उस विडंबना को दिखाता है, जहां पर्यटकों के लिए चौड़ी सड़कें बन रही हैं, लेकिन स्थानीय लोगों को आज भी बुनियादी स्वास्थ्य और सड़क सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, लेकिन आप मोदी जी के इस बयान को एक बार फिर सुनिये। अब दोस्तो एक और बयान और दावा में आपको दिखाना चाहता हूं, क्योंकि ये जो आप तस्वीर देख रहे हैं ना, डंडी कंडी डोली का सहारा लेकर बिना सड़क के अस्पताल तक पहुंचने की ये जंग। जिसे उत्तराखंड की बहन-बेटिया..मांताएं सबसे ज्यादा लड़ती है। उन्हीं महिलाओं को लेकर केन्द्र से लेकर प्रदेश सरकार ने कई योजनाएँ चलाई हैं उसी में नाम आता है नारी शक्ति का प्रतीक नारी शक्ति वंदन अधिनियम। दोस्तो लोकतंत्र में भागिदारी तब सुनिश्चित होगी जब बहन बेटियों और माताओं को सही और उचित इलाज मिल जाए तो वो अपने आपको हर जंग को लेकर तैयार कर पाएंगी तो दोस्तों, तस्वीरें आपने देखीं, दावे भी सुने और हकीकत भी आपके सामने है। एक तरफ एक्सप्रेसवे की रफ्तार है, तो दूसरी तरफ पहाड़ के गांवों में जिंदगी की जंग अब भी कंधों पर ढोई जा रही है। सवाल विकास का नहीं है, सवाल है उस विकास की पहुंच का जो हर आखिरी गांव, हर जरूरतमंद इंसान तक पहुंचे।क्योंकि जब तक डुमक जैसे गांवों में बीमार लोगों को 8 किलोमीटर कंधों पर ढोना पड़ेगा, तब तक विकास के ये दावे अधूरे ही माने जाएंगे।अब देखना होगा। क्या सिस्टम इन तस्वीरों से सबक लेता है या फिर ये सवाल यूं ही गूंजते रहेंगे क्योंकि असली विकास वही है जो सड़क ही नहीं, बल्कि जिंदगी को भी आसान बना दे।