Nanda Rajjat, लोकजात और बड़ी जात में क्या है अंतर? | Chamoli | Himalayan Culture | Uttarakhand News

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दोस्तो, मां नंदा की विदाई से जुड़ी तीन यात्राओं के नाम आपने जरूर सुने होंगे—राजजात, लोकजात और बड़ी जात, लेकिन क्या आप जानते हैं, इन तीनों में आखिर फर्क क्या है? कौन-सी यात्रा 12 साल में होती है, कौन-सी हर साल निकलती है और मां नंदा की विदाई की परंपरा में बड़ी जात का क्या महत्व है? आस्था, परंपरा और रहस्य से जुड़ी इस महायात्रा की पूरी कहानी में आज दूर करेंगे हर कंफ्यूजन! दोस्तो हिमालय की दुर्गम चोटियां, आंखों में आंसू और जुबां पर मां नंदा का नाम, उत्तराखंड की लोक संस्कृति में मां नंदा को सिर्फ एक देवी नहीं, बल्कि पहाड़ की बेटी माना जाता है। लेकिन जब भी मां नंदा की विदाई यात्रा की बात आती है, तो हमारे सामने तीन नाम गूंजते हैं— राजजात, लोकजात और बड़ी जात, अक्सर लोग कंफ्यूज हो जाता हैं कि इन तीनों में अंतर क्या है? कौन सी यात्रा हर साल होती है और किसके लिए 12 साल का लंबा इंतजार करना पड़ता है? आज इस 7-8 मिनट के वीडियो में हम आपके दिल और दिमाग के सारे कंफ्यूजन दूर करने की कोशिश करूंगा। दोस्तो आप ही में से कई दर्शकों कई बार सवाल किया सुझाव दिया। मेरी कोशिश रहती है कि हर बात का जवाब नहीं दिया जा सकता लेकिन कुछ ना कुछ जो कन्फूजन है उसको दूर किया जाय, खैर चलिए आगे बढ़ता हूं। दोस्तो उत्तराखंड में मां नंदा देवी की कई यात्राएं होती हैं, यही वजह है कि राज्य से बाहर के श्रद्धालुओं, और यहां तक कि नई पीढ़ी के युवाओं में इसे लेकर थोड़ा कंफ्यूजन रहता है। लोग अक्सर ‘राजजात’ और ‘लोकजात’ को एक ही समझ लेते हैं। असल में, ये दोनों यात्राएं मां नंदा की विदाई (ससुराल भेजने) के उत्सव हैं, लेकिन इनके आयोजन का समय, भव्यता और मार्ग पूरी तरह अलग हैं और साथ इस बार कंफ्यूजन कुछ यूं भी ज्यादा दिखाई दिया क्योंकि इस यात्रा को लेकर कई तरह के मतभेद दिखाई दिए अलग अलग गांवों के बीच में जो गांव सीधे मां नंदा की इस भव्य दिव्य यात्रा से जुड़े हैं।

यहां दोस्तो में आगे बढू उससे पहले तकरीबन अभी जो मां नंदा की यात्रा का होमकुंड में समापन हुआ। ये नंदूली देवी जी हैं इनका ये बयान अगर आपने गौर से सुना होगा होता तो बहुत कुछ है इसमें और इसी लिए लोगों में मां नंदा की यात्रा को लेकर आम लोगों में भी बड़ा कन्फ्यूजन रहता है। ये धरती जहां की बात कर रहा हूं वाण गांव है जहां लाटू देवता खुद विराजमान हैं, जो मां नंदा के धर्मभाई हैं। इनको लेकर भी मेने वीडियो बनाया है आप देख सकते हैं पूरा पेज पर जा कर लेकिन दोस्तो आज बात इस पर की यात्राओं में अंतर क्या है। सबसे पहले बात करते हैं नंदा देवी राजजात की, जिसे आम बोलचाल में ‘बड़ी जात’ भी कहा जाता है। ‘राजजात’ का मतलब है ‘राजसी यात्रा’। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, चांदपुर गढ़ी के राजवंश और कासवां के कुंवर इस यात्रा की अगुवाई करते हैं। और सवाल इस बात का कि कब होती है यात्रा, यह यात्रा हर 12 साल में एक बार आयोजित होती है और इसकी दूरी और रूट कुछ इस तरह से रहता है। यह एशिया की सबसे लंबी पैदल यात्राओं में से एक है। चमोली के नोटी गांव से शुरू होकर होमकुंड तक की लगभग 280 किलोमीटर की यह यात्रा बेहद कठिन और अलौकिक है। अब कई लोग ये कहेंगे की बड़ी जात क्यों वो इसलिए क्योंकि इसमें गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों के लोग शामिल होते हैं। इसमें चार सींगों वाला अनोखा मेढ़ा (चौसिंग्या खाडू) सबसे आगे चलता है, जो होमकुंड पहुंचकर अकेले ही हिमालय की चोटियों की ओर ओझल हो जाता है। इसे ही उत्तराखंड का ‘हिमालयी महाकुंभ’ या ‘बड़ी जात’ कहा जाता है। इसके बाद बात करते हैं उस यात्रा पर जो हर साल होती है, जिसे हम ‘नंदा देवी लोकजात’ या ‘छोटी जात’ कहते हैं। यह यात्रा हर साल भाद्रपद (अगस्त-सितंबर) के महीने में आयोजित की जाती है।

साथ ही दोस्तो क्या अंतर है के सवाल पर ये कि राजजात जहां 12 साल में एक बार राजपरिवार और पूरे उत्तराखंड के स्तर पर होती है, वहीं लोकजात पूरी तरह से ‘लोक’ यानी आम जनता और स्थानीय ग्रामीणों की श्रद्धा का पर्व है। चमोली के कुरुड़ स्थित मां नंदा भगवती मंदिर से माता की डोली वेदनी बुग्याल या लाटू देवता के मंदिर वाण गांव तक जाती है। जहां राजजात होमकुंड (बर्फ के बीच) तक जाती है, वहीं लोकजात आमतौर पर बुग्यालों (घास के मैदानों) तक जाकर संपन्न हो जाती है। इसमें स्थानीय लोग अपनी बेटी नंदा को श्रद्धा के साथ विदा करते हैं। दोस्तो चाहे वह 12 साल में होने वाली भव्य ‘राजजात’ (बड़ी जात) हो या फिर हर साल होने वाली आस्था से भरपूर ‘लोकजात’— दोनों का मर्म एक ही है। पहाड़ के लोग मां नंदा को अपनी विवाहित बेटी मानते हैं जो कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के घर रहती है। जब वह मायके आती है तो खुशियां मनाई जाती हैं, और जब वह वापस ससुराल जाती है, तो पूरा पहाड़ रो पड़ता है। यही इस पावन भूमि की अनूठी संस्कृति है। तो दर्शकों, अब आप अच्छी तरह समझ गए होंगे कि 12 साल में होने वाला महाकुंभ ‘राजजात’ या ‘बड़ी जात’ है, और हर साल स्थानीय स्तर पर होने वाली श्रद्धा की यात्रा ‘लोकजात’ है। अगली बार जब आप उत्तराखंड आएं, तो मां नंदा के इन रूपों और इस पावन संस्कृति को करीब से महसूस जरूर कीजिएगा।हां इतना जरूर है इन यात्राओं को लेकर कोई और जानकारी हो तो कृपया आप शेयर करें कमेंट कर बताएँ और वीडियो को शेयर करें।