दोस्तो, एक साल पहले आंदोलन हुआ, वादे हुए, उम्मीदें जगी, लेकिन चौखुटिया में अस्पताल का सपना आज भी अधूरा क्यों है? 50 बेड के अस्पताल की घोषणा के बाद भी क्या DPR तक तैयार नहीं हो पाई? आखिर पहाड़ के मरीज कब तक इलाज के लिए भटकते रहेंगे? सिमली से मुनस्यारी तक स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं और अब जनता ने फिर मोर्चा खोल दिया है! आखिर कब तक पहाड़ को सिर्फ घोषणाएं मिलेंगी, अस्पताल नहीं? इस बार जनता आश्वासन नहीं, जवाब और जमीन पर काम मांग रही है! तो क्या दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड को अलग राज्य इसलिए बनाया गया था ताकि 25 साल बाद भी पहाड़ के बुजुर्ग, माताएं और बहनें एक अदद डॉक्टर और अस्पताल के लिए सड़कों पर अपनी जान की भीख मांगें? अल्मोड़ा जिले के चौखुटिया से लेकर चमोली के सिमली तक, इस वक्त उत्तराखंड के पहाड़ों में भयंकर जनआक्रोश का लावा फूट चुका है! ठीक पिछले साल ‘ऑपरेशन स्वास्थ्य’ के तहत जब जनता ने 235 किलोमीटर की खौफनाक पैदल यात्रा की थी, तब सरकार ने बड़े-बड़े दावे किए थे— 50 बेड का उप-जिला अस्पताल, डिजिटल एक्स-रे मशीन, 25 लाख का बजट और छह महीने में सुधार का वादा! खुद मुख्यमंत्री ने वीडियो कॉल पर आकर आश्वासन दिया था। लेकिन आज एक साल बाद का कड़वा सच देखिए— अस्पताल की DPR तक तैयार नहीं हुई है! क्या पहाड़ की भोली-भाली जनता को मूर्ख समझना बंद करेगा सिस्टम? अब दोस्तो पहले इस क्रूर मजाक की क्रोनोलॉजी को समझो, पिछले साल जब आंदोलन उग्र हुआ, तो बागेश्वर, चमोली और पिथौरागढ़ तक के लोग चौखुटिया के समर्थन में आ गए थे। आंदोलन दबाने के लिए सरकार ने आनन-फानन में एक कंस्ट्रक्शन एजेंसी का नाम घोषित कर दिया, 25 लाख रुपये जारी करने का प्रेस नोट छाप दिया। जनता ने सरकार पर भरोसा किया और आंदोलन वापस ले लिया। लेकिन आज पूरे एक साल बाद, जब गेवाड़ घाटी के लोग उसी रामगंगा आरती घाट पर सात दिनों तक लगातार धरने पर बैठे रहे, तो देहरादून में बैठी सरकार का एक भी अधिकारी उनसे मिलने तक नहीं आया! नतीजा? आज पूरी घाटी सड़कों पर उतर आई है। अस्पताल तो छोड़िए, इस क्षेत्र के लिए स्वीकृत हुआ राजकीय पॉलिटेक्निक तक आज तक शुरू नहीं हो सका! ग्राम प्रधान, छात्र, पूर्व विधायक और वर्तमान विधायक, सब इस आक्रोश की आग में सरकार के खिलाफ खड़े हैं।
दोस्तो अगर सरकार को लगता है कि यह सिर्फ चौखुटिया की कहानी है, तो वह आंखें खोलकर अपने खुफिया तंत्र की रिपोर्ट देख ले! इस वक्त पूरे उत्तराखंड के पहाड़ों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए गृहयुद्ध जैसे हालात हैं। दोस्तो सिमली का महा-आंदोलन, चमोली जनपद के सिमली के लोग बेस अस्पताल की मांग को लेकर 200 किलोमीटर से ज्यादा की पैदल यात्रा पर देहरादून के लिए निकल चुके हैं। ऊखीमठ का संघर्ष, रुद्रप्रयाग के ऊखीमठ में स्वास्थ्य केंद्र को अपग्रेड कराने के लिए जनता को पूरे एक महीने तक उग्र आंदोलन करना पड़ा, तब जाकर सिस्टम जागा। मुनस्यारी में डॉक्टरों का अकाल, पिथौरागढ़ के सीमांत इलाके मुनस्यारी के लोग सिर्फ एक परमानेंट डॉक्टर की तैनाती के लिए हफ्तों से सड़कों पर चिल्ला रहे हैं। दोस्तो अलग राज्य बने 25 साल हो गए, लेकिन पहाड़ का सच आज भी वही है— बीमार को चारपाई पर लादकर मीलों पैदल चलो, अस्पताल पहुंचो तो डॉक्टर नहीं, और डॉक्टर मिल जाए तो वो सीधे ‘हायर सेंटर रेफर’ का पर्चा थमा देता है! आखिर कब तक पहाड़ के लोग इलाज के अभाव में रास्ते में ही दम तोड़ते रहेंगे? लेकिन दोस्तो सरकार एक बात कान खोलकर सुन ले, साल 2026 का यह पहाड़ अब बदल चुका है! पिछले साल लोग केवल वादों और प्रेस रिलीज को देखकर अपने घर लौट गए थे, लेकिन इस साल उन्होंने सबक सीख लिया है।
जनता जान चुकी है कि नेताओं की घोषणा का मतलब अस्पताल नहीं होता, और सरकारी प्रेस रिलीज का मतलब डॉक्टर नहीं होता! दोस्तो सोचिए, जिस राज्य में इतने बड़े जनआंदोलन के बाद भी सालभर में अस्पताल की एक फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक न खिसकी हो, वहां दूर-दराज के किसी छोटे से गांव की उम्मीदों का क्या हश्र होता होगा? यह सीधे-सीधे ब्यूरोक्रेसी की नाकामी और राजनीतिक इच्छाशक्ति के दिवालिएपन का सबूत है! दोस्तो अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। चौखुटिया की सड़कों पर गूंजते ये नारे और सिमली से देहरादून की तरफ बढ़ते ये कदम इस बात का ऐलान हैं कि पहाड़ की जनता अब आर-पार की लड़ाई लड़ेगी। अगर सरकार ने अब भी ठोस काम नहीं किया, तो आगामी चुनावों में इन पहाड़ों से नेताओं का बोरिया-बिस्तर समटना तय है। धामी सरकार को जवाब देना होगा कि आखिर कब तक कागजों के अस्पताल से पहाड़ के मरीजों का इलाज किया जाएगा? इस महा-आंदोलन पर आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में सरकार को अपना जवाब जरूर दें