दोस्तो क्या उत्तराखंड के पहाड़ों में बच्चों का कसूर सिर्फ इतना है कि वे पढ़ना चाहते हैं? क्या डिजिटल इंडिया और विकास के बड़े-बड़े दावों की हकीकत यही है कि नौनिहालों को स्कूल जाने के लिए हर दिन अपनी जान दांव पर लगानी पड़े? दोस्तो जरा सोचिए, एक तरफ देश के रसूखदार नेता विदेशों जैसी सड़कों और चमचमाते पुलों के भाषण देते हैं, और दूसरी तरफ उन्हीं के विधानसभा क्षेत्र के मासूम बच्चे एक अदद पुलिया के लिए उफनती नदी में बहने को मजबूर हैं! कैसे धड़ाम हो चुकी व्यवस्था पर उठ रहे सवाल बताउंगा आपको। दोस्तो मै आज आपको वो जमीनी हकिकत दिखाने जा रहा हूं जो सूबे के लोक निर्माण विभाग यानी PWD मंत्री सतपाल महाराज के गृह क्षेत्र चौबट्टाखाल की गहै जहाँ पिछले एक साल से एक बही हुई पुलिया को दोबारा बनाने की फुर्सत सरकारी अमले को नहीं मिली। अफसर फाइलों में व्यस्त हैं और बच्चे मौत के मुहाने पर! आखिर इस लापरवाही का जिम्मेदार कौन है? दोस्तो देख रहे हैं ना आप सावन और भादों के इस मौसम में जब उत्तराखंड के नदी-नाले उफान पर हैं, तब पौड़ी जिले की इस तस्वीर को देखकर किसी का भी कलेजा कांप उठेगा। हाथ में स्कूल की कॉपियां, कंधे पर बस्ता और आंखों में खौफ, ये तस्वीरें बयां कर रही हैं कि चौबट्टाखाल विधानसभा क्षेत्र के कई गांवों के बच्चे किस तरह हर दिन मौत का सफर तय कर स्कूल पहुंचने को मजबूर हैं। मामला आज का नहीं है। दौस्तो अगस्त 2025 में आई भीषण आपदा और भारी बारिश ने यहाँ कई गांवों को जोड़ने वाली एक मुख्य पुलिया को तिनके की तरह बहा दिया था। तब से लेकर आज तक यानी पूरा एक साल बीत जाने के बाद भी इस पुलिया का निर्माण दोबारा शुरू नहीं हो सका है।
दोस्तो लोगों का आक्रोश इस लिए है क्योंकि अब इन मासूम स्कूली बच्चों के सामने दो ही रास्ते हैं—या तो वे इस उफनती नदी को पार करें, जहाँ पैर फिसलते ही जिंदगी हमेशा के लिए खत्म हो सकती है, या फिर वे जंगल का वो लंबा और डरावना रास्ता चुनें जो उनके स्कूल की दूरी को 5 किलोमीटर और बढ़ा देता है। पहाड़ के घने जंगलों का यह रास्ता सिर्फ लंबा नहीं, बल्कि बेहद खतरनाक भी है, जहाँ हर वक्त गुलदार और अन्य जंगली जानवरों का हमला होने का खतरा बना रहता है। ग्रामीण लंबे समय से गुहार लगा रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन के बहरे कानों तक इन मासूमों की चीखें नहीं पहुंच रही हैं। दोस्तो इस पूरे मामले में सबसे बड़ी विडंबना और शर्म की बात यह है कि यह इलाका वीआईपी विधानसभा क्षेत्र में आता है। चौबट्टाखाल से विधायक कोई और नहीं, बल्कि प्रदेश के कद्दावर कैबिनेट मंत्री और खुद लोक निर्माण विभाग (PWD) के मुखिया सतपाल महाराज हैं। जिस PWD महकमे का काम पूरे सूबे में पुल और सड़कें बनाना है, उसी महकमे के सबसे बड़े साहब के अपने क्षेत्र में एक साल से एक छोटी सी पुलिया नहीं बन पाई। स्थानीय ग्रामीण प्रमोद रावत का कहना है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले नेता आज इन बच्चों की मजबूरी देखने के लिए जमीन पर मौजूद नहीं हैं। दोस्तो इस तस्वीर पर अब जब यह मामला तूल पकड़ने लगा और मीडिया ने इस पर सवाल उठाए, तो जिले की कमान संभाल रहीं जिलाधिकारी स्वाति एस भदौरिया ने एक रटा-रटाया प्रशासनिक जवाब जारी किया है।
जिलाधिकारी का कहना है कि बारिश से प्रभावित और क्षतिग्रस्त हुए सभी पुलों और रास्तों की रिपोर्ट जुटाई जा रही है। इस रिपोर्ट के आधार पर शासन से बजट यानी आवश्यक धनराशि स्वीकृत कराई जाएगी और फिर मरम्मत का काम शुरू होगा। लेकिन सवाल वही है कि अफसरशाही को यह रिपोर्ट जुटाने में आखिर कितने साल और लगेंगे? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? तो जिलाधिकारी साहिबा! रिपोर्ट बनती रहेगी और फाइलें आगे बढ़ती रहेंगी, लेकिन तब तक इन बच्चों की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा? पहाड़ों से पलायन को रोकने का दावा करने वाली सरकार को क्या ये तस्वीरें दिखाई नहीं देतीं? दोस्तों, चौबट्टाखाल के इन बच्चों के हक के लिए इस वीडियो को इतना शेयर कीजिए कि यह सीधे लोक निर्माण विभाग के दफ्तर तक पहुंचे। आपकी इस लापरवाही पर क्या राय है, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। देवभूमि की ऐसी ही जमीनी खबरों के लिए चैनल को सब्सक्राइब करें।