Prabhat Dhyani की पोस्ट पर Police Action? HC ने पूछा—किस कानून में? | CM Dhami | Uttarakhand News

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दोस्तो, क्या अब सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखना भी पुलिस कार्रवाई की वजह बन सकता है? क्या संसद मार्च में जाने की घोषणा करना इतना बड़ा अपराध है कि किसी को हिरासत में ले लिया जाए? यही सवाल अब उत्तराखंड हाईकोर्ट के सामने भी है। संसद मार्च में शामिल होने की सोशल मीडिया पोस्ट के बाद उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष प्रभात ध्यानी को हिरासत में लिए जाने के मामले पर हाईकोर्ट ने पुलिस से जवाब मांगा है। आखिर हिरासत किन परिस्थितियों में हुई? क्या कार्रवाई कानून के दायरे में थी या अधिकारों पर सवाल खड़े हो रहे हैं? अब इस पूरे मामले में पुलिस और सरकार को अदालत के सामने जवाब देना होगा। सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का जंतर मंतर पर प्रदर्शन चल रहा है। 20 जुलाई को जब इस प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उत्तराखंड से एक एक्टिविस्ट ऋशिकेश ट्रेन में सवार हुए तो उन्हें कथित तौर पर पुलिस ने हिरासत में ले लिया। दोस्तो जब मामला उत्तराखंड कोर्ट में पहुंचा तो अदालत ने पुलिस से पूछा कि उन्हें किस कानून और किन हालातों में हिरासत में लिया गया था? प्रदर्शन में जाने से क्यों रोका गया?दरअसल, दोस्तोसामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता प्रभाग ध्यानी उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष हैं। उन्होंने फेसबुक पोस्ट के जरिए बताया था कि वह सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के समर्थन में जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन में शामिल होने दिल्ली जा रहे हैं। वह अपने दो साथियों के साथ ऋषिकेश से ट्रेन में सवार हुए थे, उसके बाद उनका घंटों तक कुछ पता नहीं लगा।

दोस्तो परिवार का कहना है कि, रविवार शाम करीब 5:15 बजे ऋषिकेश रेलवे स्टेशन पर कुछ पुलिसकर्मी उन्हें अपने साथ ले गए. इसके बाद काफी देर तक उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. न यह बताया गया कि उन्हें कहां रखा गया है और न ही हिरासत की वजह बताई गई। इधर दोस्तो पार्टी के सचिव ने हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की, दोस्तो बता हूं कि हैबियस कॉर्पस वह याचिका है, जिसके जरिए अदालत किसी व्यक्ति की हिरासत की वैधता की जांच करती है। दोस्तो कोर्ट मे लगाई गई इस याचिका में कहा गया कि पुलिस ने हिरासत के आधार, स्थान और उनकी स्थिति के बारे में कोई जानकारी नहीं दी, जो कानून और संविधान के खिलाफ है। वहीं दोसतो सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि प्रभाग ध्यानी को रिहा कर दिया गया है और उन्हें उनकी मां की कस्टडी में रखा गया है। इस पर हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि एक वयस्क व्यक्ति को मां की कस्टडी में क्यों दिया गया? उसे फ्री क्यों नहीं छोड़ा गया? कोर्ट ने राज्य सरकार को हिरासत और रिहाई से जुड़े सभी दस्तावेज पेश करने का निर्देश दिया है। साथ ही पूछा है कि आखिर उन्हें किस कानूनी प्रावधान के तहत रोका गया था। दोस्तो याचिका में यह भी दावा किया गया है कि प्रभात ध्यानी को रामनगर पुलिस के पास एक वारंट के आधार पर रखा गया था. उनकी पत्नी उमा रानी ने ईमेल के जरिए पुलिस से जानकारी मांगी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। दोस्तो अब परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने न उनकी शिकायत स्वीकार की और न ही हिरासत से जुड़ी कोई जानकारी दी। तो दोस्तो, सवाल सिर्फ प्रभात ध्यानी का नहीं है। सवाल उस अधिकार का है, जो हर नागरिक को संविधान देता है। अगर किसी को हिरासत में लिया जाता है, तो क्या उसके परिवार को यह जानने का अधिकार नहीं कि वह कहां है और किस कानून के तहत रोका गया है? और अगर सब कुछ कानून के मुताबिक हुआ, तो फिर अदालत को पुलिस से जवाब क्यों मांगना पड़ा? अब इस मामले पर सबकी नजर हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर रहेगी। पुलिस और राज्य सरकार को अदालत के सामने अपने फैसले का कानूनी आधार रखना होगा। इसके बाद ही साफ होगा कि कार्रवाई पूरी तरह कानून के दायरे में थी या इस पूरे घटनाक्रम में प्रक्रियात्मक सवाल खड़े होते हैं..फिलहाल आप इस पूरे मामले को कैसे देखते हैं? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए। वीडियो पसंद आया हो तो लाइक करें, ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और उत्तराखंड की हर बड़ी और तथ्यात्मक खबर के लिए उत्तराखंड न्यूज़ को सब्सक्राइब करना बिल्कुल न भूलें।