क्या आज़ादी के दशकों बाद भी उत्तराखंड के 84 गांव अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं? क्या साल 2026 में भी लोग उर्दू में बने पुराने राजस्व नक्शों की वजह से परेशान हैं? और क्या इसी खामियों का फायदा उठाकर भू-माफिया ग्रामीणों की जमीनों पर कब्जे और धोखाधड़ी को अंजाम दे रहे हैं? दोस्तो देहरादून जिले के विकासनगर क्षेत्र के 84 गांवों का दर्द एक बार फिर सामने आया है। ग्रामीणों का आरोप है कि आज भी राजस्व रिकॉर्ड और पुराने उर्दू नक्शों में मौजूद विसंगतियों के कारण उन्हें अपनी जमीन से जुड़े मामलों में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि इसी स्थिति का फायदा उठाकर भू-माफिया सक्रिय हैं और लोगों की जमीनों पर विवाद बढ़ रहे हैं। दोस्तो ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी वर्षों पुरानी समस्याओं का जल्द समाधान नहीं किया गया, तो वे आने वाले चुनावों का बहिष्कार करने को मजबूर होंगे। आखिर क्या है 84 गांवों का पूरा मामला, क्यों वर्षों से नहीं सुलझ पा रही यह समस्या और प्रशासन इस पर क्या कहता है। आजादी के 8 दशक बाद भी किसान 1938 के सहारे, पुश्तैनी जमीन कागजात तक नहीं, नतीजा- चांदी काट रहे भू माफिया। दोस्तो विकासनगर तहसील अंतर्गत बिनहार क्षेत्र के दर्जनों गांव आज भी भूमि अभिलेखों की समस्या से जूझ रहे हैं। बिनहार क्षेत्र लंबे समय तक पुराने राजस्व ढांचे और ब्रिटिश कालीन रिकॉर्ड व्यवस्था के तहत संचालित होता रहा। ग्रामीणों का कहना है कि स्वतंत्रता के कई दशक बाद भी मटोगी, मदरसूं, बानाधार सहित 84 गांवों के लोगों के पास अपनी पुश्तैनी जमीन के पक्के स्वामित्व दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। दोस्तो इसी मांग को लेकर ग्रामीण एक बार फिर विकासनगर तहसील पहुंचे और उपजिलाधिकारी (SDM) को ज्ञापन सौंपकर शीघ्र समाधान की मांग की। ग्रामीणों का कहना है कि भूमि के स्पष्ट और प्रमाणित रिकॉर्ड न होने का फायदा कथित रूप से कुछ भू-माफिया उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि कई जमीनों की बार-बार फर्जी तरीके से खरीद-फरोख्त की जा रही है और कुछ मामलों में भूमि के पते एवं विवरण भी गलत दर्ज किए गए हैं।
इधर दोस्तो उपजिलाधिकारी ने ग्रामीणों को बताया कि इस मामले में कुछ महत्वपूर्ण सरकारी नक्शे उपलब्ध नहीं हैं, जबकि कई पुराने राजस्व दस्तावेज उर्दू भाषा में होने के कारण उनके सत्यापन और डिजिटलीकरण की प्रक्रिया में समय लग रहा है। प्रशासन का कहना है कि रिकॉर्ड के सत्यापन और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर समाधान निकालने का प्रयास किया जा रहा है। दोस्तो ग्रामीणों के अनुसार, इस मुद्दे को लेकर वे पहले भी कई बार एसडीएम, जिलाधिकारी और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को ज्ञापन दे चुके हैं। उनका कहना है कि हर बार कार्रवाई का आश्वासन मिलता है, लेकिन वर्षों बाद भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाया। उन्होंने आरोप लगाया कि कई बार अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर लगाने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। अब दोस्तो ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी लंबे समय से लंबित मांगों का समयबद्ध समाधान नहीं किया गया, तो वे आगामी चुनावों का बहिष्कार करने पर विचार करेंगे। हालांकि चुनाव बहिष्कार का यह निर्णय ग्रामीणों की ओर से व्यक्त चेतावनी है और प्रशासन की ओर से इस पर अभी कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, तो सवाल यही है। आखिर आज़ादी के आठ दशक बाद भी 84 गांवों के लोगों को अपनी ही पुश्तैनी जमीन का पक्का रिकॉर्ड क्यों नहीं मिल पाया? अगर पुराने नक्शे और राजस्व अभिलेख ही सबसे बड़ी बाधा हैं, तो उनके डिजिटलीकरण और सत्यापन में आखिर इतनी देरी क्यों हो रही है? और अगर ग्रामीणों के आरोप सही हैं, तो क्या इस खामी का फायदा उठाने वाले भू-माफियाओं पर कभी प्रभावी कार्रवाई होगी?अब निगाहें प्रशासन पर हैं कि वह इस लंबे समय से लंबित समस्या का कब तक समाधान निकालता है। क्योंकि यह सिर्फ जमीन का विवाद नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के अधिकार, आजीविका और सरकार पर भरोसे का भी सवाल है। फिलहाल इस खबर में इतना ही। आप क्या सोचते हैं—क्या 84 गांवों की इस समस्या का जल्द समाधान होना चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए।